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March 13, 2026 4:12 pm

सिदो-कान्हू: अंग्रेजों के खून से शौर्य-गाथा लिखने वाले ‘नायक’ थे-आजसू

राजकुमार भगत

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पाकुड़- आजसू जिला अध्यक्ष आलमगीर आलम के नेतृत्व में सिद्धू कानू पार्क स्थित सिद्धू कानू प्रतिमा पर आजसू कार्यकर्ताओं ने माल्यार्पण किया। आजसू जिला अध्यक्ष आलमगीर आलम ने कहा कि पाकुड़ धनुषपूजा में सिद्धो-कान्हू ने पहला पूजा अर्चना कर अंग्रेजो से लोहा लिया। सिद्धो-कान्हू ने 1855-56 मे ब्रिटिश सत्ता, साहुकारो, व्यपारियों व जमींदारो के खिलाफ एक विद्रोह कि शुरूवात कि जिसे संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। संथाल विद्रोह का नारा था करो या मरो अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो। सिद्धो मुर्मू ने अपनी दैवीय शक्ति का हवाला देते हुए सभी मांझीयों को साल की टहनी भेजकर संथाल हुल में शामिल होने के लिए आमंत्रन भेजा। 30 जून 1855 को भोगनाडीह में संथालो आदिवासी की एक सभा हुई जिसमें 30,000 संथाल एकत्र हुए जिसमें सिदो को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को मंत्री एवं भैरव को सेनापति चुना गया। संथाल विद्रोह भोगनाडीह से शुरू हुआ जिसमें संथाल तीर-धनुष से लेस अपने दुश्मनो पर टुट पड़े।आजसू जिला अध्यक्ष आलमगीर आलम ने कहा कि अंग्रेजो मे इसका नेतृत्व जनरल लॉयर्ड ने किया जो आधुनिक हथियार और गोला बारूद से परिपूर्ण थे। इस मुठभेड़ में महेश लाल एवं प्रताप नारायण नामक दरोगा कि हत्या कर दि गई इससे अंग्रेजो में भय का माहोल बन गया। संथाल विद्रोह के भय से अंग्रेजो ने बचने के लिए पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण कराया था। जो आज भी झारखण्ड के पाकुड़ जिले में स्थित है।
श्रद्धांजलि देने वाले में मीडिया प्रभारी अहमदुल्ला, जिला उपाध्यक्ष मुक्लेसुर रहमान, इशाकपुर पंचायत अध्यक्ष सफीकुल, महमीन आदि कार्यकर्त्ता मौजूद थे।

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