पत्थर उद्योग के बाद बीड़ी उत्पादन उद्योग के लिए भी मशहूर है पाकुड़
पाकुड़: पाकुड़ बीड़ी निर्माण के लिए मशहूर है। यहां मुस्लिम के अलावा गैर मुस्लिम समुदाय के लोग बड़ी संख्या में घरों में जाने-पहचाने बीड़ी ब्रांड के लिए बीड़ी बनाने का काम करते हैं। झारखंड की हकीकत और जीडी न्यूज लाइव की जांच पड़ताल के अनुसार जिले में ऐसे बीड़ी मजदूरों की संख्या 30 हजार से भी अधिक है।2011 की जनगणना के अनुसार, नौ लाख से कुछ अधिक की आबादी वाले पाकुड़ में रोजगार का कोई औपचारिक माध्यम नहीं है।नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने इसे ट्रांजिशन के दौर में देश के सबसे संवेदनशील जिलों में रखा है और झारखंड के दो अन्य जिलों रांची व पलामू के बाद यह तीसरा जिला है जो इस श्रेणी में आता है।एनएफआइ के अध्ययन आधार कोयला व उस पर आधारित उद्योग तीन प्रमुख उद्योग पॉवर प्लांट, स्पंज आयरन व स्टील प्लांट हैं।पाकुड़ में इन तीनों में कोई इकाई नहीं है। यानी पाकुड़ के जनजीवन के लिए यहां चुनौतियां अधिक मुश्किल भरी होंगी।इससे हटके जिला भर में बीड़ी उद्योग से बड़ा और इसके अलावा कोई विशेष उद्योग नहीं है, इसलिए आज भी यहां के अधिकांश श्रमिक बीड़ी उद्योग पर आलंबित है।यह उद्योग़ मुख्य रूप से गरीब परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया बना हुआ है।बीड़ी का काम बहुतायत आबादी में महिलाएं करती है।पाकुड़ के रहसपुर,इलामी, चांचकी, झिकरहाटी, सितापहाड़ी,नशीपुर, चेंगाडांगा, नरोत्तमपुर, संग्रामपुर, हमरुल, फरसा ,भवानीपुर, जयकिस्टोपुर समेत पूरे जिला भर के अधिकतर महिलाएं इस बीड़ी उद्योग से जुड़े हैं।हमने इन क्षेत्रों के बीड़ी मजदूरों से प्रश्न किया कि बीड़ी के अलावा आप लोगों के लिए और कौन सा रोजगार का साधन है? और सरकार ने रोजगार की क्या व्यवस्था की है? तब बीड़ी से जुड़े महिला मजदूर कहती है कि सुबह से लेकर रात नौ-दस बजे तक काम करने के बाद भी 1000 बीड़ी भी नहीं बन पाती हैं। बीड़ी के अलावा हम लोगों के पास रोजी-रोटी चलाने के लिए कोई और रोजगार भी नहीं है। न सरकार हमारे लिए कोई उचित रोजगार की व्यवस्था कर पायी है। सरकार हमारी खबर सिर्फ वोट लेने के समय लेती है। इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए अन्य महिलाएं कहती है कि पाकुड़ जिले भर में पहले के अनुसार ज्यादातर क्रशर व खदानें बंद पड़ी है।पहले इन क्रसर खदानों में पति काम कर गुजारा करते थे।अभी वह भी बंद पड़े हुए हैं।गांव में कुछ लोगों के पास थोड़ी सी जमीन भी है जिससे वह खेती कर के भी गुजारा चला लेते है। कुछ लोग दिल्ली, बंबई रोजगार के लिए निकल जाते है।आगे हमने सवाल किया कि जिस तरह से बीड़ी के काम में गिरावट आ रही है, ऐसे में आने वाले समय में यदि बीड़ी उद्योग बंद हो जाता है, तब आप गुजर-बसर कैसे चलाएगें? इसका जबाव देते हुए वहां मौजूद महिला कहती है अगर बीड़ी उद्योग बंद हो गया तो हम जैसे लोगों की भूख से मरने की नौबत आ जायेगी।आगे वह कहती है कि दिन में ज्यादातर बीड़ी मजदूर 700 से लेकर 1000 हजार बीड़ी ही बना पाते है। जिसमें हर रोज 150 से 200 रुपया कमा लेती है।साथ में स्वास्थ्य के खतरे को लेकर काफी चिंता रहती है। इनमें कमजोरी, सांस लेने में तकलीफ, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, खांसी, ब्रोंकाइटिस, शरीर में दर्द, पेट में दर्द का सामना करने वाली महिला कार्यकर्ता शामिल हैं। पाकुड़ में बीड़ी अस्पताल वर्षों से बंद रहने के कारण यह महिलाएं अपनी वार्षिक आय का लगभग 30 प्रतिशत स्वास्थ्य मुद्दों पर खर्च कर देती हैं।
जानते हैं कि बीड़ी बनती कैसे है?
बीड़ी बनाने के लिए सबसे पहले तेंदूपत्ते के तकरीबन 70-100 पत्तों को गड्डियां को धूप में सूखाया जाता है। फिर पत्तों के सूखने के बाद उन्हें पानी में भिगोकर आयताकार आकार में काटा जाता है।तब फिर कच्ची तंबाकू में पत्ते को लपेटकर उसकी नोंक को धागे से बांध दिया जाता है। ऐसे एक बीड़ी तैयार होती है।












