बजरंग पंडित
हिंदू महिलाएं रहती हैं दिनभर निर्जला उपवास
पाकुड़िया । जिलेभर में जीवित्पुत्रिका व्रत को लेकर उत्साह का माहौल है। इसके लेकर बाजार में रौनक बढ़ गई है। कुछ भ्रामक स्थिति के कारण कुछ क्षेत्र में 6 अक्टूबर को पर्व मना रहे हैं। जब की अधिकांश लोग शास्त्र संगत 7 अक्टूबर को पर्व मना रहे हैं।
शुक्रवार को प्रखंड मुख्यालय पाकुड़िया सहित मोंगलाबान्ध, फुलझींझरी, बन्नोग्राम, चौकिसाल, परुलिया, रामदेवकुंडी आदि दर्जनों गाँवो में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास पूर्ण वातावरण में नहाए खाए के साथ पर्व का प्रारंभ हुआ है। व्रत रखने वाली माताएं स्नान ध्यान के बाद व्रत कथा सुनी और अपने पुत्रों के दीर्घायु जीवन की कामना की। दरअसल, एक मां पुत्रों के कल्याण के लिए कितना त्याग करती है, जीवित्पुत्रिका व्रत इसका उदाहरण है ।इसे हमारे क्षेत्र में जिउतिया पर्व के नाम से जाना जाता है। पंडित अरुण झा ने बताया सनातन हिंदू हिन्दू में इस पर्व को सभी जाति के लोग अपने-अपने रीति रिवाज के हिसाब से मनाते हैं। इनसे जुड़ी कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। एक कथा के अनुसार प्राचीन समय में जंगल में एक चील और सियारिन रहा करती थी। दोनों में मित्रता थी। दोनों ने कुछ स्त्रियों को इस व्रत करते देखा। उसने प्रण किया कि वे भी इस व्रत को करेंगे। दोनों ने व्रत प्रारंभ किया। भूख के कारण सियारिन की हालत खराब हो गयी। वह भूख बर्दाश्त नहीं कर पायी और चुपके से भोजन कर ली। नतीजा यह निकला कि सियारिन के जितने भी बच्चे हुए कुछ ही दिनों में मृत हो गये जबकि चील के बच्चों को दीर्घ जीवन मिला। इसके अलावा इस व्रत के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी जाती है। इस कथा में कहा गया है कि गंधर्वो के राजकुमार का नाम जीभूतवाहन था। एक दिन वह जंगल में भ्रमण कर रहा था। उसे एक विलाप करती वृद्धा दिखी। उसके रोने का कारण पूछने पर उसने कहा कि वह नागवंश की स्त्री है। गरुड़ को भोजन देने के लिए उसके पास अपने पुत्र के अलावा और कुछ नहीं है। राजकुमार ने वृद्धा को वचन दिया कि वह उसके पुत्र को बचाएगा। उसके बाद वह स्वयं लाल कपड़े में लिपटाकर गरुड़ के सामने लेट गया। गरुड़ आए और वह उसे उठाकर पहाड़ पर ले गए। चंगुल में फंसे व्यक्ति की कोई प्रतिक्रिया न देखकर गरुड़ ने उससे उसका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने गरुड़ को पूरी जानकारी दी। गरुड़ ने जीमूतवाहन की बहादुरी और परोपकार की भावना को देखकर जीवन दान दे दिया और नागो की बली न लेने का वरदान भी दिया। पुत्र को जीवन दान मिलने से इस व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत के रुप में मनाया जाता है। हिंदू महिलाएं इस पर्व को बहुत ही सावधानी पूर्वक मानती हैं। अपने पुत्र के लिए निर्जला उपवास रखती हैं और अगले दिन पारण करके व्रत को छोड़ती हैं।










