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April 21, 2026 9:38 am

बिना वेंडर करोड़ों की सप्लाई, एक ही व्यक्ति पर दो नामों से भुगतान लेने का मामला।

निविदा प्रक्रिया दरकिनार, रिटायर्ड नेटवर्क और “सेटिंग” से चल रहा खेल, घटिया सामग्री पर भी उठे सवाल।

पाकुड़ सदर प्रखंड में 14वीं और 15वीं वित्त आयोग के तहत कराए गए विकास कार्यों को लेकर बड़े पैमाने पर अनियमितता के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों और सूत्रों का दावा है कि बिना किसी अधिकृत वेंडर की नियुक्ति के ही करोड़ों रुपये की सामग्री की सप्लाई कराई गई, जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।ग्रामीणों के अनुसार, सप्लाई का काम बाहरी लोगों के जरिए कराया गया और स्थानीय स्तर पर न तो किसी वैध निविदा प्रक्रिया की जानकारी साझा की गई और न ही अधिकृत वेंडरों की सूची सार्वजनिक की गई।इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि नियमों को दरकिनार कर सप्लाई का पूरा खेल संचालित किया गया।
सूत्र बताते हैं कि सामग्री की खरीद और आपूर्ति में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। बिलिंग प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।चर्चा है कि एक ही व्यक्ति द्वारा अलग-अलग नामों से बिल जमा कर भुगतान लिया गया, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है। मामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि एक प्रखंड स्तरीय पदाधिकारी ने सरकारी सेवा के दौरान अपनी पत्नी के नाम मनरेगा से जुड़े वेंडर के कागजात तैयार करवाए थे। सेवानिवृत्ति के बाद उसी नेटवर्क के जरिए सप्लाई का काम जारी रहने की बात सामने आ रही है। सूत्रों का कहना है कि पुराने संपर्कों का इस्तेमाल कर “सेटिंग” के जरिए काम हासिल किया जा रहा है और इसके बदले लाभ पहुंचाने के संकेत भी दिए जाते हैं। वहीं, सप्लाई की गई सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि घटिया सामग्री के कारण कई योजनाएं शुरू होते ही बेअसर हो गई हैं। जल मीनारों के काम नहीं करने, हैंडवॉश स्टेशनों के जल्दी खराब होने और अन्य निर्माण कार्यों के टिकाऊ नहीं रहने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।पंचायतों में स्थापित “ज्ञान केंद्र” योजना भी सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्धारित सामग्री के स्थान पर दूसरी वस्तुएं लगाई गईं और कई जगह जरूरी उपकरण उपलब्ध ही नहीं कराए गए, जिससे योजना की उपयोगिता प्रभावित हुई है।ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि पारदर्शी तरीके से जांच कराई जाए तो बड़े स्तर की गड़बड़ी उजागर हो सकती है और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई संभव है।फिलहाल बिना वेंडर नियुक्ति करोड़ों की सप्लाई, संदिग्ध बिलिंग, घटिया सामग्री और रिटायर्ड नेटवर्क के जरिए काम कराने के आरोप प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या रुख अपनाता है और जांच की दिशा क्या होती है।

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