नई डीसी-एसपी के सामने चुनौतियों का अंबार, जल संकट से जूझती जिंदगी और अधूरी योजनाओं पर उठे सवाल।
पाकुड़: “प्रगतिशील” का तमगा लिए पाकुड़ जिला जमीनी हकीकत में बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। शहर की सड़कों पर गड्ढों का जाल, बिजली की अनियमित आपूर्ति, पेयजल संकट और स्वास्थ्य-शिक्षा की कमजोर व्यवस्था ने विकास के दावों की पोल खोल दी है।
हाल ही में पदस्थापित नई उपायुक्त मेघा भारद्वाज और पुलिस अधीक्षक के सामने सबसे पहली चुनौती शहर की जर्जर सड़कों और बिजली संकट के रूप में उभरकर सामने आई है।आने वाले दिनों में जल संकट और शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर भी प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा बनने वाली है।कुछ दिन पहले मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने जिले के दौरे के दौरान सड़कों की स्थिति पर नाराजगी जताई थी और अधिकारियों को जिम्मेदारी का एहसास कराया था। इसके बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं, जिससे आम लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।
लिट्टीपाड़ा में पानी के लिए होती है जंग
जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड में पेयजल संकट विकराल रूप ले चुका है। यहां लोगों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है। नहाने के लिए गंदे नालों का सहारा लेना मजबूरी बन गया है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है।गौरतलब है कि पूर्व में 217 करोड़ रुपये की जलापूर्ति योजना स्वीकृत हुई थी, लेकिन पाइप चोरी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह योजना अधूरी रह गई। इससे ग्रामीणों की उम्मीदें भी टूटती नजर आ रही हैं।
सड़कें बनी हादसों का कारण
जिले में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं। नई बनी सड़कें भी कुछ ही समय में गड्ढों में तब्दील हो जा रही हैं, जबकि मरम्मत कार्य नहीं के बराबर है। इससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना हुआ है।
स्वास्थ्य-शिक्षा की भी खराब हालत
सदर अस्पताल में प्राथमिक इलाज के बाद मरीजों को बाहर रेफर कर दिया जाता है या निजी नर्सिंग होम जाने की सलाह दी जाती है, जिससे गरीबों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। वहीं, शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के दावों के बावजूद कई स्कूलों में संसाधनों और शिक्षकों की कमी साफ नजर आती है।
विधानसभा तक पहुंची आवाज
स्थानीय विधायक हेमलाल मुर्मू ने जलापूर्ति योजना समेत कई मुद्दों को विधानसभा में उठाया है और क्षेत्र की समस्याओं को प्रमुखता से रखा है।अब जनता की नजर नई उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक पर टिकी है। लोगों को उम्मीद है कि वे जमीनी समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए ठोस कदम उठाएंगे, ताकि “प्रगतिशील पाकुड़” का दावा सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए, बल्कि धरातल पर भी दिखे।






