ट्रेन का पता नहीं, आधे घंटे पहले ही बंद हो जाती है सड़क, राहगीर
मरीजों और स्कूली बच्चों के कीमती समय से खिलवाड़, शिक्षक
रेलवे बैरिकेड कर्मियों की मनमानी से जनता त्रस्त, एंबुलेंस और स्कूली बच्चे घंटों फंसे रहते हैं जाम में
सतनाम सिंह
पाकुड़ के मालपहाड़ी सड़क स्थित रेलवे फाटक इन दिनों राहगीरों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है। कोयला और पत्थर ढुलाई वाली मालगाड़ियों के आवागमन के दौरान रेलवे बैरिकेड कर्मियों की कथित मनमानी ने आम जनता की परेशानी को दोगुना कर दिया है।मालगाड़ी आने के निर्धारित समय से करीब आधा घंटा पहले ही फाटक बंद कर दिया जाता है, जिससे सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं।
मरीजों के लिए ‘काल’ बन रहा इंतजार
यह सड़क न केवल स्थानीय आवागमन का माध्यम है, बल्कि पश्चिम बंगाल को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय संपर्क मार्ग भी है। प्रतिदिन पाकुड़ से रेफर किए गए दर्जनों गंभीर मरीज इसी रास्ते से बंगाल के अस्पतालों की ओर जाते हैं। फाटक समय से बहुत पहले बंद होने के कारण एंबुलेंस घंटों जाम में फंसी रहती हैं।परिजनों का कहना है कि ‘गोल्डन ऑवर’ में मिलने वाला इलाज रेल फाटक की इस देरी की भेंट चढ़ रहा है।
छात्र और शिक्षक भी परेशान
सिर्फ मरीज ही नहीं, बल्कि सुबह के समय विद्यालय जाने वाले शिक्षक और छात्र-छात्राएं भी इस अव्यवस्था के शिकार हो रहे हैं। आधे-आधे घंटे के अनावश्यक इंतजार के कारण बच्चों की कक्षाएं छूट रही हैं और शिक्षक समय पर स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं।स्थानीय लोगों का आरोप है कि पत्थर और कोयला रेल पॉइंट से आने वाली मालगाड़ियों के लिए कर्मियों द्वारा बैरिकेड गिराने में भारी लापरवाही बरती जा रही है।नियमों के मुताबिक ट्रेन आने के कुछ समय पहले फाटक बंद होना चाहिए, लेकिन यहाँ ‘मनमानी’ का आलम यह है कि पटरी खाली होने के बावजूद राहगीर धूप और धूल में खड़े रहने को मजबूर हैं।
क्या कहते हैं राहगीर?
हमें हर दिन यहाँ घंटों खड़ा रहना पड़ता है। कर्मी अपनी सुविधा के अनुसार फाटक बंद कर देते हैं, उन्हें जनता की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं है। उच्चाधिकारियों को इस पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए।अब देखना यह है कि रेल प्रशासन इस अव्यवस्था को कब सुधारता है या फिर जनता इसी तरह कुप्रबंधन की पटरी पर पिसती रहेगी।








