हिंदू धर्म में कुश घांस को भगवान विष्णु के बारह अवतार के शरीर से उत्पन्न माना जाता है, इसका उपयोग पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है
बजरंग पंडित
पाकुड़िया प्रखंड के तिरपियानदी, राधानगर पहाड़, साहित्य अन्य जल स्रोत के स्थान पर बरसा ऋतु के बाद एवं दुर्गा पूजा से पहले इन दिनों कुश घांस देखने को मिल रहा है। धार्मिक वेदों और पुराणों में कुश घांस को पवित्र माना गया है। इसे कुशा, भी कहा गया है। मल्य पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के वराह अवतार के शरीर से कुशा बनी है। हिंदू धर्म के अनुष्ठान और पूजा- पाठ में कुशा का उपयोग किया जाता है कोई भी धार्मिक अनुष्ठान जैसा कि पूजा पाठ से पूर्व कुशा की अंगूठी बनाकर तीसरी उंगली में पहनी जाती है। जिसे पवित्री कहा जाता है। ग्रंथों में बताया गया है इसके उपयोग से मानसिक और शारीरिक पवित्रता हो जाती है। पूजा-पाठ के लिए जगह पवित्र करने के लिए कुश से जल छिड़का जाता है।अर्थवेद में कुश घांस के लिए कहा गया है कि इसके उपयोग से गुस्से पर कंट्रोल रहता है।इसे अशुभ निवारक औषधि भी कहा गया है। जानकारों से पता चलता है कि पूर्व में कुश का तेल निकाला जाता था और उसका उपयोग दवाई के तौर पर किया जाता था। वहीं कुश घांस भगवान विष्णु के शरीर से बनी होने के कारण पवित्र मानी गई है। मत्स्य पुराण की कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध कर के पृथ्वी को स्थापित किया। उसके बाद अपने शरीर पर लगे पानी को झाडा तब उनके शरीर से बाल पृथ्वी पर गिरे और कुशा के रूप में बदल गए। इसके बाद कुशा को पवित्र माना जाता है।






