चैनपुर (पलामू): जहाँ एक ओर देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, किसी भी विवादित भूमि पर न्याय का अंतिम द्वार मानी जाती है, वहीं चैनपुर अंचल कार्यालय ने अपनी एक “समानांतर न्याय व्यवस्था” खड़ी कर दी है। मामला चैनपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली 29 एकड़ बेशकीमती जमीन का है, जिसमें अंचल कार्यालय की कार्यशैली पर गंभीर भ्रष्टाचार और संवैधानिक उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा: मामला लंबित, फिर भी बदल गया मालिकाना हक
हैरानी की बात यह है कि जिस भूमि का विवाद देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट ) में विचाराधीन है और जहाँ अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, उस भूमि का ‘डिमांड ट्रांसफर’ अंचल कार्यालय द्वारा किसी दूसरे पक्ष के नाम पर कर दिया गया। नियमतः, जब मामला ‘सब-जुडिस’ (न्यायालय के अधीन) होता है, तो राजस्व रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार का बदलाव करना कानूनन अपराध और न्यायपालिका की अवमानना (कांटेम्पट ऑफ़ कोर्ट ) की श्रेणी में आता है।
आम नागरिक का उठ रहा भरोसा
स्थानीय लोगों और पीड़ित पक्ष का कहना है कि चैनपुर अंचल कार्यालय के अधिकारी शायद खुद को देश के संविधान और सुप्रीम कोर्ट से ऊपर समझने लगे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि:
आखिर किसके आदेश पर इतनी बड़ी विवादित भूमि का म्यूटेशन या डिमांड ट्रांसफर किया गया?
क्या भू-माफियाओं और राजस्व अधिकारियों के बीच कोई गुप्त सांठगांठ है?
अगर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों का सम्मान नहीं होगा, तो आम गरीब नागरिक अपनी जमीन को भू-माफियाओं से कैसे सुरक्षित रख पाएगा?
बड़े घोटाले की आहट: जांच की मांग
यह मामला केवल एक जमीन के टुकड़े का नहीं है, बल्कि सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता का है। 29 एकड़ जैसी विशाल भूमि का इस तरह से हस्तांतरण एक बहुत बड़ी लापरवाही या सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करता है।
मुख्य मांगें:
चैनपुर अंचल के संबंधित अधिकारियों के खिलाफ तत्काल उच्च स्तरीय जांच (विजिलेंस इन्क्वायरी ) बैठाई जाए।
जिस आईडी और डिजिटल हस्ताक्षर से यह अवैध ट्रांसफर हुआ है, उसे चिह्नित कर संबंधित अधिकारी पर कानूनी कार्रवाई हो।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने के जुर्म में अंचल कार्यालय पर Contempt of Court का मामला दर्ज हो।
निष्कर्ष
यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब अंचल कार्यालय के अधिकारी पूरे ब्लॉक की सरकारी और पैतृक जमीनों को भू-माफियाओं के हवाले कर कहीं और स्थानांतरण (ट्रांसफर ) लेकर चले जाएंगे। शासन और प्रशासन को इस ‘संवैधानिक संकट’ पर तुरंत संज्ञान लेने की आवश्यकता है।
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