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June 9, 2026 12:48 am

पचुवाड़ा खदान के खिलाफ चौथे दिन भी समाहरणालय पर डटे आदिवासी

पचुवाड़ा कोयला खदान विस्थापित मोर्चा’ के बैनर तले अनिश्चितकालीन धरना जारी, कानूनन खनन को बताया अवैध।

आरटीआई से खुलासा- बिना आधिकारिक भूमि अधिग्रहण के ही उजाड़ दी गईं हरी-भरी फसलें, कंपनियों पर गंभीर आरोप।

पाकुड़ में ‘पचुवाड़ा कोयला खदान विस्थापित मोर्चा’ के बैनर तले पचुवाड़ा मध्य व उत्तर कोल ब्लॉक के प्रभावित रैयतों और आदिवासियों का आक्रोश सातवें आसमान पर है। समाहरणालय के समक्ष अपनी ज़मीन, हक और वजूद की लड़ाई लड़ रहे ग्रामीणों का अनिश्चितकालीन धरना सोमवार को चौथे दिन भी जारी रहा।आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मोहन मुर्मू और मुन्नी हांसदा ने जिला प्रशासन सहित खनन कंपनियों पीएसपीसीएल व डब्लूबीपीडीसीएल के खिलाफ तीखा आक्रोश व्यक्त किया। बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीणों और महिलाओं के तीखे तेवरों को देखते हुए समाहरणालय परिसर में पुलिस बल को अलर्ट मोड पर रखा गया है।

कागजों में नहीं हुआ भूमि अधिग्रहण, फिर भी चल रहा खनन: मुन्नी हांसदा

धरने को संबोधित करते हुए आदिवासी कल्याण परिषद की सचिव मुन्नी हांसदा ने सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेजों का हवाला देते हुए जिला प्रशासन और कंपनियों के गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिला भू-अर्जन कार्यालय के अनुसार, पाकुड़ में इन कंपनियों के लिए ‘भू-अर्जन अधिनियम 2013’ के तहत किसी भूमि का अर्जन ही नहीं किया गया है। नियमतः कोयला खनन के लिए भूमि का अधिग्रहण भारत सरकार के ‘कोल बेयरिंग एक्ट’ के तहत होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी वैध कानूनी प्रक्रिया के ही कठालडीह, चिलगो, बीसनपुर और पचुवाड़ा में आदिवासियों की निजी जमीनों से अवैध रूप से कोयला निकाला जा रहा है।

बिचौलियों के जाल में फंसे ग्रामीण,विधवा महिलाओं के साथ अन्याय

अमरापाड़ा प्रखंड के चिलगो गाँव से आईं विस्थापित महिला गोलके मुर्मू ने नम आँखों से अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया, “शुरुआत में ग्राम सभा ने ज़मीन देने से साफ मना कर दिया था। लेकिन कंपनी के अधिकारियों और रमेश मुर्मू व जॉन सोरेन जैसे बिचौलियों ने हमें गुमराह किया। 50,000 बोनस और मकान के नाम पर 15 लाख अतिरिक्त देने का लालच देकर हमारा गाँव खाली करा लिया गया। आज हमारे पास न घर है, न ज़मीन।” उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने कई विधवा महिलाओं को यह कहकर पुनर्वास लाभ और मकान देने से मना कर दिया कि उनके पति जीवित नहीं हैं, जो अमानवीयता की पराकाष्ठा है।

जल, जंगल, जमीन की बात करने वालों ने आदिवासियों को भीखमंगा बनाया”

विस्थापितों को समर्थन देने धरना स्थल पर पहुँचीं पूर्व जिला परिषद सदस्य और भाजपा नेत्री मेरी नीला सोरेन ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन पर जमकर तीर चलाए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर सीधा हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “जल, जंगल, जमीन की हितैषी बनने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री ने आदिवासियों के साथ सबसे बड़ा छल किया है। जनता ने जिस भरोसे के साथ उन्हें सत्ता सौंपी, उन्होंने उसी जनता को अपनी ही पुश्तैनी ज़मीन से बेदखल कर भीखमंगा बना दिया।भाजपा नेत्री ने उपायुक्त (डीसी) पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कड़ाके की धूप में आंदोलन कर रहे ग्रामीणों के लिए प्रशासन ने पानी, बिजली या पंखे तक की व्यवस्था नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि डीसी महोदया असल विस्थापितों से मिलने के बजाय कथित बिचौलियों और दलालों के साथ बंद कमरों में बैठकें कर रही हैं।राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (ST Commission) के सख्त आदेश के बावजूद जिला प्रशासन समन्वय बैठक टाल रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्ष 2025 से बारूद मैगजीन का लाइसेंस अवैध होने के बावजूद खदान क्षेत्र में धड़ल्ले से भारी ब्लास्टिंग की जा रही है, जो सुरक्षा मानकों का खुला उल्लंघन है।

युवाओं को मिला रोजगार का ‘लॉलीपॉप’, डंपरों से जान का जोखिम

ग्रामीणों ने कहा कि भारी मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनियाँ विस्थापित युवाओं को महज 6,000 से 7,000 हजार की मासिक पर खटा रही हैं, जिससे इस महंगाई में परिवार पालना मुमकिन नहीं है। जहाँ कभी हरी-भरी फसलें लहलहाती थीं, वहाँ आज धूल का गुबार है। इसके अलावा, सरकारी सड़कों पर दौड़ने वाले भारी डंपरों से आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि कंपनियों ने अपना अलग रास्ता नहीं बनाया और रैयतों को उनका हक नहीं दिया, तो कोयला उत्खनन व ट्रांसपोर्टिंग का काम पूरी तरह ठप कर उग्र आंदोलन किया जाएगा। इस मौके पर देवेंद्र डेहरी, प्रेमलाल मुर्मू, रानी हांसदा, लखीराम मुर्मू, चैतर हेंब्रम सहित सैकड़ों ग्रामीण पारंपरिक हथियारों और तख्तियों के साथ मुस्तैदी से डटे रहे।

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