सतनाम सिंह
पाकुड़: ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ने और महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाने के सरकारी दावे धरातल पर किस कदर दम तोड़ते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पाकुड़ जिला मुख्यालय के निकटवर्ती सरायढेला गांव में देखने को मिल रहा है। गोवर्धन योजना के तहत करीब 50 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से झारखंड का सबसे बड़ा सामुदायिक बायोगैस प्लांट बनकर तैयार तो हो गया, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण दो वर्ष बीत जाने के बाद भी यह चालू नहीं हो सका है। नतीजतन, 142 परिवारों के घरों तक पाइपलाइन से सस्ती और स्वच्छ गैस पहुंचाने का सपना आज भी फाइलों में दफन है।
लाखों की लागत, पर ढाक के तीन पात
वर्ष 2024 में जब इस महत्वाकांक्षी परियोजना की नींव रखी गई थी, तब इसे सरायढेला गांव की तस्वीर बदलने वाली बड़ी पहल बताया गया था। योजना के मुताबिक, ग्रामीणों को अपने पशुओं का गोबर प्लांट में देना था, जिसके बदले उन्हें खाना पकाने के लिए किफ़ायती बायोगैस मिलनी थी। इससे न केवल ग्रामीणों की एलपीजी सिलेंडर और लकड़ी पर निर्भरता कम होती, बल्कि जैविक खाद के उत्पादन से कृषि को भी बढ़ावा मिलता। विडंबना देखिए कि वर्ष 2026 की छमछमाती धूप में भी यह प्लांट चालू होने की राह तक रहा है और ग्रामीण आज भी पारंपरिक चूल्हों के धुएं में फूंक मारने को मजबूर हैं।
महिलाओं की उम्मीदों पर फिरा पानी
इस परियोजना से सबसे ज्यादा उम्मीदें गांव की महिलाओं को थीं। उन्हें लग रहा था कि रसोई में लकड़ी और उपलों से निकलने वाले जानलेवा धुएं से हमेशा के लिए निजात मिल जाएगी। साथ ही, गैस सिलेंडर पर होने वाला घरेलू खर्च भी बचेगा। लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की इस बड़ी योजना का लाभ अब तक उन तक नहीं पहुंच सका है, जिससे पूरे गांव में विभाग के प्रति गहरी निराशा और आक्रोश है।
आखिर कब तक चलेगा बहानों का दौर?
जब सर्वे के दौरान गांव में पर्याप्त पशुधन पाया गया और गोबर की उपलब्धता को लेकर कोई समस्या नहीं थी, तो महज ‘चूल्हा उपलब्ध न होने’ जैसे तकनीकी बहानों के कारण 50 लाख की योजना को दो साल तक लटकाए रखना प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा है। ग्रामीण अब तीखे सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इस विलंब के लिए जिम्मेदार कौन है और उन्हें इस योजना का हक कब मिलेगा?







