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September 25, 2026 4:02 pm

कड़वा है पर सच है झारखण्ड के मंत्री दीपिका पांडेय की बेटी तृषा का हस्र और सबक

बच्चों को नशेड़ी और रफ्तार का सौदागर मत बनाइये 

आचार्य श्रीहरि

झारखंड के ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय की बेटी तृषा सिंह और उसके तीन दोस्त नशे में थे, उन्हें होश ही नहीं था, कार की स्पीड ज्यादा थी। कार में शराब की बोतले थी और चखने भी थे, दो लड़के और दो लड़कियां थी। दो लड़के और दो लड़कियां होना, कार में शराब की बोतले होना, यह प्रमाणित करने के लिए काफी था कि ये पूरी अय्याशी के मूड में थे। इनके पास आत्मघात के सभी हथियार उपलब्ध थे।
चारों लड़के और लड़कियां नाबालिग थे, उनके पास ड्राविंग लाइसेंस थे नहीं। कानूनी रूप से वे ड्राविंग लाइसेंस के हकदार भी नहीं थे। फिर वे कार ड्राइव कैसे कर रहे थे, सीधे तौर पर ये गैर कानूनी ढंग से गाड़ी-कार चला रहे थे। कार इन्हें दिया कौन था? नाबालिग को चलाने के लिए कार देना एक आपराधिक मामला बनता है। कोई नाबालिग अगर कार ड्राइव करते हुए पकड़ा जाता है तो फिर उसके अभिभावक पर कानूनी कार्रवाई होती है। प्रमाणित तौर पर नाबालिग ही कार चला रहे थे तो फिर दीपिका पांडेय सहित अन्य सभी के अभिभावकों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, इनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज होनी चाहिए।
दीपिका पांडेय की बेटी तृषा और अन्य सभी स्कूली छात्र थे, ये कॉलेज के भी छात्र नहीं थे। स्कूली छात्र का शराब पीने और अय्याशी करना कितना खतरनाक और चिंता की बात है। इतनी कम उम्र में नशे का शिकार हों जाने से कई प्रकार के प्रश्न खड़े होते हैं। ये पहली बार तो शराब पिये नहीं होंगे, आदत तो लंबी होगी। अपराध के घेरे मे अभिभावक और स्कूल के शिक्षक तथा स्कूल संचालक भी आते हैं। स्कूल के शिक्षक को सबकुछ पता होता है कि कौन छात्र कैसा है। पर आज के शिक्षक और स्कूल संचालक सिर्फ अपनी फीस और शिक्षा की दुकानदारी पर ध्यान देते है। जिस छात्र की मां राज्य का मंत्री हो, उसे नैतिकता और नशे से दूर रहने का पाठ पढ़ाने की ग़लती स्कूल संचालक और शिक्षक कैसे कर सकते हैं? बिरनी के खोते में हाथ डालने का अर्थ सबको मालूम है।
चारों के पिता अति धनवान है। अति धनवान के पास काला धन भी अनिवार्य तौर पर खूब होता है। अति धनवान अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने लिखने के दौरान एटीएम कार्ड ही दे देते हैं। जितनी मर्जी हो उतनी मनमानी करो, ऐश-मौज करो, कार के रफ्तार में डूब जाओ, मौज मस्ती में डूब जाओ, अय्याशी में डूब जाओ, यानी कि अति धनवान अभिभावक अपने बच्चों को पतन की और खुद ही ढकेलते है। खासबात यह है कि अपने बच्चों को नामी प्राइवेट स्कूलों के हॉस्टल सिस्टम में डाल कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। आजकल स्कूलों और कॉलेजों के सामने नशे के सौदागरों का जाल भी होता है। जब मौज मस्ती के लिए अथाह पैसा मिलेगा तो फिर बच्चे तो नशे में डूबेंगे ही, रफ्तार में आत्मघाती बनेंगे ही। इसे कौन रोक सकेगा? इसीलिये कहा गया है कि जब पैसा बोलता है तब तब नशे, और रफ्तार का शौक जानलेवा साबित होता है।
यह भौतिकवादी युग है , घोर पतन का युग है, गला काट प्रतिस्पर्द्धा का युग है, हर कोई आगे निकलने के होड़ में लगा हुआ है। लोग टेंशन में फंसे हुए हैं। उन्हें अपने बच्चों पर भी ध्यान रखने का समय नहीं है। ये अपने बच्चों के नशेपन को भी नहीं देख पाते हैं, रफ्तार के प्रति बच्चों की दीवानगी को नहीं देख पाते हैं, उनकी अनैतिकता को नहीं देख पाते हैं, उनके हिंसक स्वभाव को नहीं देख पाते हैं। बड़े-बड़े शहरों में हर साल बच्चों की हिंसा से जुड़ी लोमहर्षक घटनाएं घटती हैं। बड़े बाप के बच्चे हर साल अपनी गाड़ी के रफ्तार से हजारों जिंदगियों का संहार कर दिया करते हैं। तृषा सिंह और अन्य अगर किसी चलती कार या अन्य वाहन से टकराते या फिर राह चलते लोगों को उड़ाते तो फिर तृषा का गिरोह अपने साथ साथ अन्यों की जिंदगी का भी संहार कर देते।

तृषा और उसके दोस्तों की आत्मघाती मृत्यु अभिभावकों के लिए एक सबक है। अपने बच्चों को नशेड़ी मत बनने दीजिए, अपने बच्चों को रफ्तार का सौदागर मत बनने दीजिए, अपने बच्चों को अय्याश मत बनाइये, अपने बच्चों को मौत के मुंह में जाने के लिए आर्थिक संसाधन मत दीजिए। बच्चों को अच्छे संस्कार दीजिए, उन्हें नैतिकता सिखाइए, बच्चों को उतना ही छूट दीजिए जो उनकी अनिवार्य जरूरत है। बच्चों पर निगरानी रखिए। अगर दीपिका पांडेय और अन्य के अभिभावकों ने अपने-अपने स्कूली बच्चों को अच्छे संस्कार दिए होते और अपने स्कूली बच्चों पर निगरानी रखे होते तो फिर तृषा सिंह और अन्य बच्चे इस तरह काल के मुंह में खुद नहीं गए होते। अति सर्वत्र वर्जयते।

प्रेषक :
आचार्य श्रीहरि
नई दिल्ली

Mobile: : 9315206123

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