न भवन था, न संसाधन; बेल के पेड़ की छांव में सजती थी पाठशाला, संघर्ष और समर्पण से बदली विद्यालय की तस्वीर
पाकुड़। कभी गांव के आंगन तो कभी बेल के पेड़ के नीचे चटाई बिछाकर बच्चों को पढ़ाने वाली प्राथमिक विद्यालय किताझोर की प्रधानाध्यापिका सरिता हेंब्रम 37 वर्षों की शिक्षकीय सेवा पूरी कर विदा हुईं। उनके सम्मान में आयोजित विदाई समारोह में संघर्ष और समर्पण की कहानी सुनकर हर आंख नम हो गई।
जनवरी 1988 में जब उन्होंने शिक्षण कार्य शुरू किया था, तब विद्यालय का अपना भवन नहीं था और महज 10 बच्चे नामांकित थे। संसाधनों के अभाव में पेड़ के नीचे बैठाकर बच्चों को पढ़ाना पड़ता था। लगातार मेहनत और समर्पण का परिणाम है कि आज विद्यालय में 282 बच्चे नामांकित हैं। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए सरिता हेंब्रम भावुक हो गईं। उन्होंने सहकर्मियों और ग्रामीणों का आभार जताते हुए अभिभावकों से बच्चों को नियमित विद्यालय भेजने की अपील की। कहा कि शिक्षा ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव है। समारोह में ग्राम प्रधान, ग्राम शिक्षा समिति के सदस्य, शिक्षक-शिक्षिकाएं और अभिभावक मौजूद रहे।







