धीरेन साहा
पाकुड़िया हनुमान मंदिर पाकुड़िया में रामनवमी महोत्सव पर आयोजित रामकथा के तीसरे और अंतिम दिन बुधवार रात्रि को राम-सीता विवाह प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं ने जय श्री राम के जयकारे लगाए। कथा वाचक गौतम जी महराज ने राम-सीता के विवाह की कथा सुनाते हुए बताया कि राजा जनक के दरबार में भगवान शिव का धनुष रखा हुआ था। एक दिन सीता ने घर की सफाई करते हुए उसे उठाकर दूसरी जगह रख दिया। उसे देख राजा जनक को आश्चर्य हुआ, क्योंकि भगवान शंकर का पिनाक धनुष किसी से उठता नहीं था। राजा ने प्रतिज्ञा किया कि जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से सीता का विवाह होगा। उन्होंने स्वयंवर की तिथि निर्धारित कर सभी देश के राजा और महाराजाओं को निमंत्रण पत्र भेजा। समारोह में अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रामचंद्र एवं लक्ष्मण अपने गुरु विश्वामित्र के साथ उपस्थित हुए। यहां राजा जनक घोषणा करते हैं कि भगवान शिव के धनुष को जो तोड़ेगा, वही सीता से विवाह करेगा। एक- एक करके तमाम राजाओं ने धनुष तोड़ने का प्रयास किया, लेकिन कोई इसे हिला तक नहीं सका। यह सूचना पाकर राजा जनक क्रोधित हो जाते हैं और कह देते हैं कि क्या यह पृथ्वी वीरों से खाली है। यह शब्द लक्ष्मण को चुभ जाते हैं और क्रोधित होकर क्षत्रियों के इतिहास का बखान करते हैं। विश्वामित्र उन्हें शांत कर प्रभु राम को धनुष तोड़ने की आज्ञा देते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि राम ने धनुष कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, तीनों काम इतनी फुर्ती से किए कि किसी को पता ही नहीं लगा। सबने राम को धनुष खींचे खड़े देखा। उसी क्षण राम ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भयंकर कठोर ध्वनि सब लोकों में छा गई। शिव धनुष तोड़कर भी राम सहज ही रहे। सफलता की चरम सीमा पर भी विनम्र बने रहना सज्जनों का गुण है। इसके बाद धूमधाम से सीता व राम का विवाह हुआ। माता सीता ने जैसे प्रभुराम को वर माला डाली वैसे ही देवता फूलों की वर्षा करने लगे। इस अवसर पर यहां सीता स्वयं वर,शिव धनुष तोड़ने और राम सीता विवाह का झांकी प्रदर्शन किया गया जिसे देख लेग मंत्र मुग्ध रह गए ।







