झारखंड हाईकोर्ट ने बहादुर महतो एवं अन्य की याचिका पर सुनाया फैसला, मामूली मानदेय पर वर्षों से काम कर रहे शिक्षा कर्मियों की उम्मीदें बढ़ीं।
रांची। झारखंड में वर्षों से शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बनकर काम कर रहे प्रखंड साधन सेवी (बीआरपी) और संकुल साधन सेवी (सीआरपी) के लिए हाईकोर्ट का फैसला बड़ी राहत लेकर आया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने नियमितीकरण और वेतनमान से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया है। इससे पिछले 15 से 20 वर्षों से मामूली मानदेय पर सेवाएं दे रहे इन कर्मियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को महत्वपूर्ण न्यायिक समर्थन मिला है। बहादुर महतो एवं अन्य की ओर से दायर याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले 26 अक्टूबर को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था।दरअसल, वर्ष 2004 के बाद सर्व शिक्षा अभियान के तहत बीआरपी और सीआरपी की नियुक्तियां शुरू की गई थीं। इनका दायित्व स्कूलों में शैक्षणिक गतिविधियों की निगरानी, शिक्षकों को शैक्षणिक सहयोग, विद्यालयों का निरीक्षण और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना रहा है। बाद में सर्व शिक्षा अभियान को समग्र शिक्षा अभियान में शामिल कर दिया गया, लेकिन इन कर्मियों की सेवा शर्तों और नियमितीकरण का सवाल बरकरार रहा।
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि वे वर्षों से शिक्षा विभाग के महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वहन कर रहे हैं। स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था से लेकर मध्याह्न भोजन योजना की निगरानी तक की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों के अनुरूप वेतनमान और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। लंबे सेवाकाल के बाद भी मामूली मानदेय पर काम करना उनकी प्रमुख पीड़ा रही है। हाईकोर्ट के इस फैसले से राज्यभर के बीआरपी और सीआरपी कर्मियों में नई उम्मीद जगी है।






