महुआ शराब के साथ कई औषधीय गुणों के लिए भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।
पाकुड सहित पूरे जिले भर के आदिवासियों समाज के लिए जंगल का पीला सोना कहे जाना वाला महुआ आय का एक मुख्य स्रोत है जीवन यापन के लिए,जिले के विभिन्न गांव में मार्च अप्रैल माह में आदिवासी महिलाएं सुबह-सुबह घर से टोकरी लेकर महुआ के पेड़ के नीचे महुआ चुनने पहुंच जाती है। यह आदिवासी महिलाओं की आय का एक प्रमुख श्रोत है। यह भी विना किसी लागत के इसे प्रकृति का उपहार कह सकते हैं। इसे बेचकर आदिवासी अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं । इसे जंगल का पीला सोना भी कहते हैं।जिसके फल फूल को इकट्ठा कर उसे सुखा कर ग्रामीण महिलाएं आय अर्ज करते है। प्रखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में महुआ का फुल टपकना शुरू हो गया है । फूलों को इकट्ठा करने के लिए आदिवासी ग्रामीण महिलाएं टोकरी लेकर सुबह में निकल पड़ती है । इसका बाजार में कीमत 45 रुपये से लेकर 120 रुपये किलो है । महुआ ग्रामीण आदिवासियों की आय का प्रमुख श्रोत है। महुआ का उपयोग केवल शराब बनाने में नहीं किया जाता । यह औषधीय गुणों से भरपुर होता है । इससे लड्डू, पापड़ी, अचार आदि खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं। यही नहीं इससे बनने वाला शर्बत ग्रीष्म काल में शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है। यह महुआ फूल जितना इंसानों के लिए लाभदायक है उतना ही मवेशियों के लिए भी उपयुक्त है। गाय, बैल, भैस आदि पालतू पशुओं को महुआ खिलाया जाता है।आदिवासी महुआ फूल का उपयोग शराब बनाने में करते हैं। इसका उपयोग केवल नशा के लिए उपयोग नहीं किया जाता। यह उनके परंपरा में शामिल है। आदिवासी संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक माहुआ शराब जरूरत है। इसलिए आदिवासियों के लिए यह खास माना जाता है। यही नहीं महुआ फूल के बाद पेड़ से फल भी गिरता है। इसके बीज को सुखाकर तेल निकालते हैं ।





