नो एंट्री पर यह कैसे संभव ये तो जिम्मेदार ही जाने।
सुदीप कुमार त्रिवेदी
पैसे की परत जब आँखों पर चढ़ता है तब केवल पैसा ही दिखता है, ऐसी स्थिति में पर्यावरण का क्षरण व इंसानी दर्द का एहसास तक नहीं होता है । इन पंक्तियों के अर्थ को समझना हो तो आपको पाकुड़ नगर परिषद के हर वार्ड में आना पड़ेगा, जहाँ हर दिन वार्ड के लोग परेशानी व दर्द को चुपचाप झेलते हैं क्योंकि उनको इस तरह के दर्द देने वाले व विभाग के साँठगाँठ का सच पता है । पूरे पाकुड के मुहल्ले के सड़क की चौड़ाई इतनी है कि एक समय में एक ही ट्रैक्टर पार हो सकता है जबकि इस सड़क पर बीसियों दफा विपरित दिशा से दो ट्रैक्टर पार होते हैं फिर कुछ देर के लिए मोहल्ले की आम जिंदगी थम सी जाती है । बालू लदे ट्रैक्टरों का जमावड़ा अहले सुबह ही पुराने उपायुक्त कार्यालय से लेकर धनुषपूजा स्कूल तक लग जाता है । नो इंट्री के लगने से पहले तक तो ये बालू लदे ट्रैक्टर मुख्य सड़क से अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं लेकिन नो इंट्री लगते ही बालू लदे ट्रैक्टर धनुषपूजा व छोटी अलीगंज के इसी सड़क का प्रयोग करते हैं । मोहल्ले की महिलाएँ पानी के लिए सड़क पर ही अपनी बारी का इंतजार करती है, बच्चे स्कूल जाते हैं, सब्जी वाले सब्जी बेचने आते हैं, मोहल्ले वासियों के ये दैनंदिनी कार्य तेज गति से आते ट्रैक्टरों के कारण थम जाते हैं, कभी कभी इस बात को लेकर लोग विरोध भी करते हैं लेकिन ट्रैक्टर चालक पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है, लिहाजा लोगों ने इसे अपनी नियति की तरह स्वीकार लिया है । बालू माफियाओं की एक पूरी टीम बालू ट्रैक्टर को निकालने हेतु शहर के हर चौक चौराहों पर मौजूद रहते हैं । आलम तो ये है कि इस बीच अगर किसी प्रशासनिक अधिकारी की गाड़ी निकलती है तो इसकी जानकारी इनको पहले ही हो जाती है और इन्ही के द्वारा उस वक्त कथित तौर पर ड्यूटी कर रहे ट्रैफिक के जवानों को भी दी जाती है । सूत्रों के अनुसार किसी भी अधिकारी के हरकत की सूचना इनको अंदर वाले ही देते हैं । हर दिन दुर्घटना की आशंका में जीने वाले छोटी अलीगंज जैसे कई मोहल्लों के लोगों के दर्द के बीच एक सवाल यह भी है कि प्रशासनिक अमला अगर सक्रीय है तो फिर पर्यावरण का क्षरण करने वाले लोग और इनकी टीम इतनी सक्रिय क्यों है ?





