लिट्टीपाड़ा की पथरीली ज़मीन पर प्यास अब सिर्फ़ एक समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी बन चुकी है जो हर दिन इंसान की मजबूरी और व्यवस्था की बेरुख़ी का आईना दिखाती है। यहाँ आदिवासी और पहाड़िया समाज के लोग पानी की हर बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहीं महिलाएं मीलों दूर पहाड़ों और गड्ढों से पानी ढो रही हैं, तो कहीं बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं।
सरकारों ने योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए, नल-जल योजनाओं के पोस्टर लगे, भाषणों में विकास की नदियाँ बहाई गईं, लेकिन हकीकत यह है कि लिट्टीपाड़ा के कई गांव आज भी सूखे होंठों के साथ आसमान की ओर उम्मीद से देखते हैं। यह विडंबना ही है कि जिन लोगों ने जंगल, पहाड़ और प्रकृति को बचाकर रखा, आज वही लोग पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत के लिए तरस रहे हैं। विकास की फाइलें दफ्तरों में दौड़ती रहीं, मगर गांवों तक पानी नहीं पहुंचा।
ग्रामीणों के अंदाज में कहें तो—
“कागज़ों में बहती रही योजनाओं की नदी, गांव की प्यास मगर सूखी ही रह गई। हुकूमत ने वादों के बादल तो बहुत भेजे, पर बूंद एक भी ज़मीं तक न आ सकी।”
लिट्टीपाड़ा की तस्वीर अब सवाल बन चुकी है— क्या पहाड़िया और आदिवासी समाज की प्यास सिर्फ़ चुनावी भाषणों तक सीमित रहेगी? क्या पानी के लिए हर रोज़ जोखिम उठाते इन लोगों की तकलीफ़ कभी सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी?
आज हालात ऐसे हैं कि लोग तंज में कहते हैं— “आदमी भी अपना, सरकार भी अपनी, फिर भी अपनेपन का एहसास कहीं खो गया। प्यासे होंठ पूछ रहे हैं अब,
आख़िर विकास का पानी किस ओर बह गया?” लिट्टीपाड़ा विधानसभा की प्यास सिर्फ़ पानी की नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी है जो धीरे-धीरे सूखता जा रहा है।






