पितृ चंद्र शाही ने दी राजपरंपरा को मजबूती, रानी ज्योतिर्मय देवी ने पीतल के रथ से बढ़ाई भव्यता
पाकुड़ की ऐतिहासिक रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी राजपरंपरा, पहाड़िया विरासत और जनआस्था का जीवंत प्रतीक है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि करीब 40 किलोमीटर दूर लिट्टीपाड़ा प्रखंड के कंचनगढ़ की पहाड़ियों से जुड़ी मानी जाती है। स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, कंचनगढ़ क्षेत्र में कभी पहाड़िया समाज का प्रभाव था और यहां की पहाड़ियां व गुफाएं पुरानी पहाड़िया राजसत्ता की स्मृतियों से जुड़ी रही हैं। पाकुड़ प्रशासन की वेबसाइट पर भी कंचनगढ़ पहाड़ी के समीप स्थित एक अंडाकार संरचना को तत्कालीन पहाड़िया राजा के स्थल के रूप में स्थानीय मान्यता प्राप्त होने का उल्लेख है।
रथयात्रा के इतिहास में वर्ष 1697 को महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसी दौर में पाकुड़ राजवंश के प्रथम राजा पितृ चंद्र शाही ने भगवान मदन मोहन की रथयात्रा को राजपरंपरा के रूप में व्यवस्थित स्वरूप दिया। भगवान मदन मोहन पाकुड़ राजपरिवार के आराध्य देव माने जाते रहे हैं। राजपरिवार के संरक्षण में शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे आम लोगों की आस्था का पर्व बन गई और इसमें समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता बढ़ती गई।
रथयात्रा की परंपरा को आगे बढ़ाने में रानी ज्योतिर्मय देवी की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। स्थानीय राजपरंपरा और जनश्रुतियों के अनुसार, उनके समय में भगवान मदन मोहन के लिए विशेष पीतल का रथ बनवाया गया था। यह रथ राजपरिवार की धार्मिक आस्था और शिल्प परंपरा का प्रतीक बना। रानी ज्योतिर्मय देवी के समय रथयात्रा को भव्यता मिली और इसके साथ लगने वाला मेला भी लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया।
समय के साथ राजपरिवार के निवास और राजसत्ता के केंद्र में बदलाव आया, लेकिन रथयात्रा की परंपरा कायम रही। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बाद राजपरिवार का संबंध कंचनगढ़ से हटकर हिरणपुर प्रखंड के मोहनपुर से जुड़ा और वर्ष 1815 के आसपास राजा सितेश चंद्र शाही के वहां बसने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद भी भगवान मदन मोहन की रथयात्रा जारी रही। वर्ष 1826 में पाकुड़ राज के तृतीय राजा गोपीनाथ पांडेय के राजपाठ संभालने के बाद भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया गया। वहीं, वर्ष 1856 के आसपास राजपरिवार के पाकुड़ शहर में स्थायी रूप से बसने के बाद रथयात्रा का केंद्र भी पाकुड़ शहर बन गया।
आज भगवान मदन मोहन की रथयात्रा राजापाड़ा स्थित मंदिर से शुरू होती है। विधि-विधान से भगवान को रथ पर विराजमान कराने के बाद श्रद्धालु उत्साह और भक्ति के साथ रथ की रस्सी खींचते हैं। रथ शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए मौसीबाड़ी पहुंचता है, जहां भगवान के एक सप्ताह तक विश्राम करने की परंपरा है। रथयात्रा के साथ लगने वाला मेला भी पाकुड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
कंचनगढ़ की पहाड़ियों से शुरू हुई ऐतिहासिक स्मृतियों से लेकर मोहनपुर और फिर पाकुड़ शहर तक पहुंची रथयात्रा की यह परंपरा समय के साथ भले ही कई पड़ावों से गुजरी हो, लेकिन इसकी निरंतरता आज भी कायम है। पितृ चंद्र शाही से मिली राजपरंपरा, रानी ज्योतिर्मय देवी के समय मिली भव्यता और बाद के राजाओं के संरक्षण से विकसित यह आयोजन आज पाकुड़ की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कंचनगढ़ से राजापाड़ा तक की यह यात्रा तीन सदियों से आस्था, परंपरा और जनविश्वास की जीवंत कहानी कह रही है।
Related Posts

नीट पेपर लीक और छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में कांग्रेस का हल्ला बोल, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग।





