आस्था, परंपरा और प्रकृति से जुड़ा है दीयों का महत्व; मिट्टी के दीपक जलाने से जीवंत रहती है सदियों पुरानी संस्कृति
राजकुमार भगत
पाकुड़। दीपावली पर घर-आंगन में जलते मिट्टी के छोटे-छोटे दीपक केवल अंधकार दूर नहीं करते, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश भी देते हैं। सनातन परंपरा में मिट्टी के दीपक को पंचतत्वों का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि दीप प्रज्वलित करने से घर में सकारात्मकता, सुख-समृद्धि और मंगल का संचार होता है। यही वजह है कि आधुनिक विद्युत झालरों और आकर्षक लाइटों के बढ़ते प्रचलन के बावजूद दीपावली पर मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान और महत्ता बनी हुई है।
पंचतत्वों का प्रतीक है मिट्टी का दीपक।
सनातन दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पांच महाभूतों से सृष्टि की रचना हुई है। मिट्टी का दीपक इन पंचतत्वों के प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है। मिट्टी पृथ्वी का, उसमें प्रयुक्त तेल या घी जल तत्व का और जलती लौ अग्नि का प्रतीक मानी जाती है। वहीं प्रकाश और उससे उत्पन्न ऊष्मा जीवन में ऊर्जा एवं चेतना का संदेश देते हैं। धार्मिक दृष्टि से दीपक जलाना अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाने का प्रतीक है।
मंगल और शनि ग्रह से भी जुड़ी है मान्यता।
ज्योतिषीय मान्यताओं में मिट्टी को मंगल तथा दीपक में प्रयुक्त तेल को शनि ग्रह से जोड़कर देखा जाता है। मंगल को साहस, ऊर्जा और पराक्रम, जबकि शनि को कर्म, अनुशासन और न्याय का कारक माना गया है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि मिट्टी के दीपक जलाने से शुभ प्रभाव प्राप्त होते हैं। हालांकि, ये ज्योतिषीय विश्वास हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।
श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाने की परंपरा।
प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, 14 वर्षों का वनवास पूरा कर भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा को दीपावली के प्रकाश पर्व से जोड़कर देखा जाता है। आज भी दीपावली की संध्या पर घरों के मुख्य द्वार, आंगन, छत, मंदिर और पूजा स्थलों पर मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। मां लक्ष्मी के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।
दीपावली से कुम्हारों के घरों में भी जलती है खुशियों की रोशनी।
दीपावली का पर्व केवल आस्था और उल्लास ही नहीं, बल्कि मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के लिए रोजगार का बड़ा अवसर भी लेकर आता है। त्योहार नजदीक आते ही कुम्हार महीनों पहले से दीये तैयार करने में जुट जाते हैं। पारंपरिक हाथ से चलने वाले चाक की जगह अब इलेक्ट्रॉनिक चाक ने काम को आसान बना दिया है। इससे कम समय में अधिक दीपक तैयार किए जा रहे हैं। साधारण दीयों के साथ आकर्षक डिजाइन और कलात्मक दीपकों की भी बाजार में मांग बनी हुई है।
मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कारीगरों को दें सम्मान।
बाजार में रंग-बिरंगी विद्युत झालरों और सजावटी लाइटों की चमक भले ही बढ़ गई हो, लेकिन मिट्टी के दीयों का पारंपरिक आकर्षण आज भी कायम है। मिट्टी के दीये खरीदना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि उन कुम्हार परिवारों की मेहनत और आजीविका को सम्मान देना भी है, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। प्राकृतिक मिट्टी से बने दीये उपयोग के बाद आसानी से मिट्टी में मिल जाते हैं। ऐसे में इनका इस्तेमाल स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के साथ पारंपरिक शिल्प और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देता है। वास्तव में दीपावली का असली संदेश केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि मन से अज्ञान, निराशा और नकारात्मकता का अंधकार मिटाकर ज्ञान, सद्भाव और खुशियों का प्रकाश फैलाना है। इस बार मिट्टी के दीये जलाकर अपनी संस्कृति को संजोने के साथ उन कारीगरों के घरों में भी खुशियों की रोशनी पहुंचाएं, जिनकी मेहनत से दीपावली जगमगाती है।






