सुप्रीम कोर्ट की सख्त गाइडलाइन: 3 साल से पुराने 304-B, 498-A और BNS 80/85 के केस प्राथमिकता पर; गवाही डे-टू-डे, बेवजह तारीख पर रोक
दहेज हत्या और प्रताड़ना के मामलों में वर्षों तक चलने वाली अदालती प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। State of U.P. vs Ajmal Beg मामले में 20 अगस्त 2026 के आदेश में कोर्ट ने IPC की धारा 304-B व 498-A तथा इनके समकक्ष BNS की धारा 80 व 85 से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने और लंबित मामलों की नियमित निगरानी के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की पेशी जल्द सुनिश्चित की जाए और आरोप तय करने का प्रयास अधिमानतः 60 से 90 दिनों के भीतर किया जाए। आरोप तय होने के बाद गवाही जल्द शुरू कर CrPC की धारा 309/BNSS की धारा 346 के तहत लगातार या दिन-प्रतिदिन सुनवाई की दिशा में आगे बढ़ने को कहा गया है। हालांकि 60-90 दिन का मानक सामान्यतः पालन किए जाने वाला निर्देशात्मक बेंचमार्क है; कई आरोपी, सप्लीमेंट्री चार्जशीट, फोरेंसिक देरी या अन्य असाधारण परिस्थितियों में कारण दर्ज किए जा सकते हैं।
3 साल पुराने केसों पर खास नजर
जिला न्यायपालिका को 3 साल से अधिक पुराने दहेज हत्या व प्रताड़ना के मामलों की पहचान करनी होगी। खासकर वे मामले जिनमें अभी आरोप तय होना या गवाही दर्ज होना बाकी है, उनकी मासिक या तिमाही समीक्षा की जाएगी। हाईकोर्ट को भी पुराने लंबित मामलों की स्थिति पर नजर रखने को कहा गया है।
गवाहों के लिए बनेगा कैलेंडर, बेवजह तारीख पर रोक
आरोप तय होने के तुरंत बाद ट्रायल कोर्ट को यथासंभव विटनेस कैलेंडर तैयार करना होगा। इसमें महत्वपूर्ण गवाहों के बयान की तारीख, समन की तामील और गवाही का क्रम तय किया जाएगा। अनावश्यक स्थगन को हतोत्साहित किया गया है और तारीख देने पर लिखित कारण दर्ज करने को कहा गया है। आरोपी का वकील पर्याप्त कारण के बिना बार-बार अनुपस्थित रहे तो लीगल एड काउंसिल या एमिकस क्यूरी की मदद लेकर सुनवाई आगे बढ़ाई जा सकेगी। जांच अधिकारी के तबादले या सेवानिवृत्ति से भी गवाही नहीं अटके, इसके लिए वैकल्पिक अधिकारी नामित करने के निर्देश हैं।
कोर्ट डैशबोर्ड से होगी निगरानी
हाईकोर्ट को मौजूदा कोर्ट डैशबोर्ड/CIS व्यवस्था में इन मामलों की स्टेज-वाइज पेंडेंसी, डिजिटल डैशबोर्ड, पुराने मामलों के ऑटोमेटेड अलर्ट और मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा गया है। हाईकोर्ट में लंबित पुरानी अपील, रिवीजन, जमानत और CrPC 482/BNSS 528 से जुड़े मामलों की भी समय-समय पर समीक्षा का निर्देश है।
हर मामले में मध्यस्थता नहीं, केवल उपयुक्त वैवाहिक विवादों में
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन मामलों में मुख्य रूप से वैवाहिक विवाद है और मौत, गंभीर शारीरिक हिंसा या अन्य गंभीर अपराध के आरोप नहीं हैं, उनमें कानून के अनुसार उपयुक्त पाए जाने पर मध्यस्थता या काउंसिलिंग का विकल्प तलाशा जा सकता है। गंभीर आपराधिक मामलों की प्रकृति और पक्षकारों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जाएगा।
दहेज निषेध अधिकारियों से लेकर वन स्टॉप सेंटर तक व्यवस्था मजबूत होगी
राज्यों को Dowry Prohibition Officers की नियुक्ति/नामांकन, उनकी जिम्मेदारियों और संपर्क विवरण को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही वन स्टॉप सेंटर, फैमिली काउंसिलिंग सेंटर, महिला हेल्प डेस्क, पीड़ित सहायता तंत्र, हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करने को कहा गया है।
स्कूलों में दहेज विरोधी जागरूकता, अधिकारियों की ट्रेनिंग
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा के खिलाफ शिक्षा के स्तर पर भी अभियान चलाने की बात कही है। पाठ्यक्रम, जागरूकता अभियान और लीगल लिटरेसी कार्यक्रमों के जरिए दहेज विरोध, लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं के अधिकारों पर जागरूकता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस, न्यायिक अधिकारियों, अभियोजकों, संरक्षण अधिकारियों और काउंसलरों को भी समय-समय पर प्रशिक्षण देने को कहा गया है।
इन धाराओं पर लागू होंगे निर्देश
- IPC 304-B — दहेज मृत्यु
- BNS 80 — दहेज मृत्यु का समकक्ष प्रावधान
- IPC 498-A — पति/ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता
- BNS 85 — क्रूरता का समकक्ष प्रावधान
- CrPC 309 — गवाही की लगातार/दिन-प्रतिदिन सुनवाई से संबंधित प्रावधान
- BNSS 346 — नए कानून में इसका समकक्ष प्रावधान
- Dowry Prohibition Act, 1961 — दहेज लेने-देने पर रोक और दहेज निषेध अधिकारियों की व्यवस्था
- CrPC 482 / BNSS 528 — हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों से जुड़े मामलों की भी पुराने लंबित प्रकरणों में समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट को हर साल तीन बार रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों को 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को अनुपालन/स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। रिपोर्ट में लंबित और निस्तारित मामलों के आंकड़े, केस की स्टेज, जागरूकता अभियान, दहेज निषेध अधिकारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और उठाए गए कदमों का विवरण देना होगा। अगली सुनवाई के लिए अनुपालन रिपोर्ट के साथ मामले 15 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किए गए हैं।
झारखंड में भी कार्रवाई तेज
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद झारखंड में हाईकोर्ट और झालसा स्तर से जिला न्यायपालिका को अनुपालन के लिए निर्देश दिए गए हैं। ऐसे में राज्य की अदालतों में लंबित 304-B, 498-A और BNS 80/85 के पुराने मामलों की स्थिति पर अब ज्यादा करीबी नजर रहेगी। उद्देश्य साफ है—दहेज के गंभीर अपराधों में वर्षों तक मुकदमा लंबित रहने के बजाय जांच से लेकर ट्रायल तक की प्रक्रिया को ज्यादा व्यवस्थित और समयबद्ध बनाया जाए




