न सूचना पट्ट, न नियमित तकनीकी निगरानी; निर्माण के बीच पतली छड़ और सामग्री की गुणवत्ता पर उठे सवाल
पाकुड़। दुर्गापुर रोड स्थित डीएफओ कार्यालय के समीप ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल की ओर से निर्माणाधीन इंडोर स्टेडियम की गुणवत्ता और विभागीय निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। करीब आधा से ज्यादा निर्माण पूरा होने के बावजूद स्थल पर योजना से संबंधित सूचना पट्ट नहीं लगाया गया है। वहीं, निर्माण में इस्तेमाल हो रही ईंट, छड़ समेत अन्य सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं। मौके पर नियमित रूप से जेई-एई या संवेदक के प्रतिनिधि की मौजूदगी नहीं होने की बात भी सामने आई है। स्थल पर एक मिस्त्री और दो मजदूरों के भरोसे काम चलते मिलने से निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। निर्माण में पतली छड़ के इस्तेमाल और मानकों की अनदेखी के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि सरकारी राशि से बन रहे भवन की गुणवत्ता की नियमित तकनीकी जांच किस स्तर पर हो रही है। मामले में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता सुभाष सिंह ने कहा कि निर्माण कार्य में कुछ कमियां सामने आने की जानकारी है। कनीय अभियंता ने हाल में स्थल का निरीक्षण किया है। संबंधित एजेंसी को कमियां दूर करने और गुणवत्ता में सुधार के निर्देश दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता से समझौता नहीं होने दिया जाएगा।

तबादले के बाद भी कर्मचारी के पाकुड़ में रहने पर सवाल
इसी विभाग में कर्मचारी सुनील कुमार के तबादले को लेकर भी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि सुनील कुमार का तबादला कई महीने पहले पाकुड़ से साहिबगंज किया जा चुका था। इसके बावजूद वे लंबे समय तक पाकुड़ स्थित विभागीय कार्यालय में नजर आते रहे। इससे यह सवाल उठ रहा है कि तबादले के बाद उन्हें पाकुड़ में किस आदेश या अनुमति के तहत काम करने दिया गया। इस संबंध में कार्यपालक अभियंता सुभाष सिंह से पक्ष लिया गया तो उन्होंने कहा कि सुनील कुमार को विरमित कर दिया गया है और तबादला किए गए सभी कर्मचारियों को विभाग से विरमित किया जा चुका है। हालांकि, तबादले के कई महीनों बाद तक सुनील कुमार के पाकुड़ कार्यालय में देखे जाने की स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े करती है। अब सवाल यह है कि यदि कर्मचारी का तबादला साहिबगंज हो चुका था और उसे विरमित भी कर दिया गया था, तो इसके बाद भी वह पाकुड़ में किस आधार पर कार्य करता रहा? क्या इसके लिए कोई विभागीय आदेश जारी हुआ था? यदि हुआ था तो उसकी अवधि क्या थी और आदेश किस स्तर से दिया गया? इन सवालों का स्पष्ट जवाब विभागीय स्तर से सामने आना बाकी है। एक ओर निर्माण कार्य में पारदर्शिता और तकनीकी निगरानी को लेकर सवाल हैं, तो दूसरी ओर तबादले के बाद कर्मचारी के लंबे समय तक पाकुड़ में बने रहने का मामला विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। अब निगाहें विभागीय कार्रवाई और जांच पर टिकी हैं।








