गड्ढों और कीचड़ में तब्दील हुआ गांव का मुख्य रास्ता, बारिश में बच्चों से मरीजों तक की बढ़ जाती है मुसीबत।
इकबाल हुसैन
महेशपुर (पाकुड़)। विकास के दावों के बीच महेशपुर प्रखंड के कनीझड़ा गांव की बदहाल सड़क व्यवस्था की पोल खोल रही है। गांव की मुख्य सड़क करीब 20 साल से मरम्मत की बाट जोह रही है, लेकिन ग्रामीणों की परेशानी दूर करने के लिए अब तक ठोस पहल नहीं हुई। सड़क जगह-जगह टूटकर गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। हालात ऐसे हैं कि लोगों के लिए अपने ही गांव में सुरक्षित आवागमन करना चुनौती बन गया है।
20 साल में सड़क की सुध लेने वाला कोई नहीं।
ग्रामीणों के अनुसार, करीब दो दशक पहले बनी इस सड़क की इसके बाद न तो समुचित मरम्मत हुई और न ही नए सिरे से निर्माण कराया गया। समय के साथ सड़क की गिट्टियां उखड़ती चली गईं और अब इसका बड़ा हिस्सा बदहाल हो चुका है। सड़क की स्थिति देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीणों को रोजाना किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
बारिश में सड़क नहीं, मुसीबत का रास्ता बन जाता है।
सूखे मौसम में किसी तरह आवागमन हो भी जाता है, लेकिन बारिश होते ही सड़क पर कीचड़ और जलजमाव की समस्या गंभीर हो जाती है। फिसलन भरे रास्ते पर चलना जोखिम भरा हो जाता है। स्कूली बच्चों को आने-जाने में परेशानी होती है, वहीं बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना भी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि खराब रास्ते के कारण कई बार एंबुलेंस के गांव तक पहुंचने में भी परेशानी होती है।

शिकायतें और आश्वासन, लेकिन सड़क जस की तस।
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क की बदहाली को लेकर मुखिया से लेकर प्रखंड और जिला प्रशासन तक गुहार लगाई गई, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। सवाल यह है कि जब एक सड़क करीब 20 वर्षों से मरम्मत की प्रतीक्षा कर रही है, तो जिम्मेदार विभाग ने इसकी सुध क्यों नहीं ली? क्या ग्रामीणों को बुनियादी सुविधा के लिए भी वर्षों तक इंतजार करना पड़ेगा?
ग्रामीणों की मांग—सर्वे नहीं, अब धरातल पर दिखे काम।
कनीझड़ा के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से सड़क की तत्काल स्थिति का आकलन कराकर पक्की सड़क के निर्माण की दिशा में ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ऐसी सड़क चाहिए जिस पर बच्चे सुरक्षित स्कूल जा सकें और जरूरत पड़ने पर मरीजों को बिना परेशानी अस्पताल पहुंचाया जा सके। अब देखना है कि ग्रामीणों की इस समस्या पर प्रशासन कब संज्ञान लेता है और करीब दो दशक पुरानी बदहाली से गांव को कब निजात मिलती है।








