राजकुमार भगत
पाकुड़, ईश्वरम्मा की पुण्य तिथि पर बुधवार को पूरे विश्व में श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वरम्मा दिवस मनाया गया। यह अवसर उनके आदर्श जीवन, मातृत्व, करुणा और मानव सेवा के प्रति समर्पण को याद करने का दिन है।
श्री सत्य साईं बाबा की माता ईश्वरम्मा भले ही एक साधारण ग्रामीण महिला थीं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में असाधारण दिव्यता झलकती थी। उनका जीवन सादगी, प्रेम और निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा। वे हमेशा गरीबों, जरूरतमंदों और बच्चों के प्रति करुणा से भरी रहती थीं और समाज के हर वर्ग के दुख-दर्द में सहभागी बनती थीं।
मातृत्व का व्यापक स्वरूप
ईश्वरम्मा का मातृत्व केवल अपने पुत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे समाज के प्रति उनके मन में समान स्नेह और अपनापन था। यही वजह है कि भक्त आज भी उन्हें “सर्वमाता” के रूप में श्रद्धा से स्मरण करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने धैर्य, सहनशीलता और आस्था का मार्ग नहीं छोड़ा।
बच्चों के प्रति विशेष स्नेह
ईश्वरम्मा बच्चों को भगवान का रूप मानती थीं। उनका विश्वास था कि बच्चों का पालन-पोषण प्रेम, संस्कार और नैतिक शिक्षा के साथ होना चाहिए। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए श्री सत्य साईं बाबा ने बाल विकास (Bal Vikas) कार्यक्रम की शुरुआत की, जो बच्चों में नैतिकता, अनुशासन और सेवा भावना विकसित करता है।
समाज कल्याण के तीन संकल्प
ईश्वरम्मा की प्रेरणा से श्री सत्य साईं बाबा ने समाज के लिए तीन महत्वपूर्ण संकल्पों को साकार किया—
निःशुल्क शिक्षा: सभी के लिए समान और उच्च स्तरीय शिक्षा
निःशुल्क चिकित्सा: आर्थिक अभाव के कारण कोई इलाज से वंचित न रहे
शुद्ध पेयजल: हर व्यक्ति तक स्वच्छ पानी की उपलब्धता
इन पहलों के माध्यम से आज भी लाखों लोग लाभान्वित हो रहे हैं और सेवा कार्य निरंतर जारी हैं।
प्रेरणादायक संदेश
ईश्वरम्मा का जीवन स्पष्ट संदेश देता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-अर्चना में नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और त्याग में निहित है। उनके आदर्शों को अपनाकर समाज में शांति, सद्भाव और करुणा का विस्तार किया जा सकता है।







