पाकुड़ जिले में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का भव्य आयोजन पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ किया गया।इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपने नजदीकी मंदिरों में जाकर भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की और सुख-समृद्धि की कामना की।
मदन मोहन मंदिर में जुटी भारी भीड़, पीतल के रथ पर विराजमान हुए भगवान
रथयात्रा को लेकर सुबह से ही श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा गया। राजा पाड़ा स्थित ऐतिहासिक मदन मोहन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जुटी। श्रद्धालु सुबह से ही स्नान कर और नए वस्त्र धारण कर मंदिर पहुंचने लगे थे। मंदिर के मुख्य पुरोहित ने पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ भगवान मदन मोहन की विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इसके बाद, शुभ मुहूर्त में भगवान मदन मोहन की प्रतिमा को कालीबाड़ी मंदिर में रखे ऐतिहासिक पीतल के रथ पर पूरे आदर और मान-सम्मान के साथ विराजमान किया गया।
हल्की बारिश के बीच ढोल-नगाड़ों की धुन पर झूमे भक्त
जैसे ही भगवान रथ पर विराजमान हुए, पूरा परिसर ‘जय जगन्नाथ’ और ‘हरे कृष्ण’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। भक्तों ने भगवान को पान, बताशा, लड्डू तथा विभिन्न प्रकार के मौसमी फल अर्पित किए। रथयात्रा के दौरान मौसम ने भी करवट ली और हल्की बारिश शुरू हो गई। इस सुहाने मौसम में ढोल-नगाड़ों और ताशे की थाप पर भक्तजन जमकर झूमते-नाचते नजर आए।शाम होते-होते कालीबाड़ी मैदान में श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। रथयात्रा शहर के विभिन्न चौक-चौराहों से होते हुए अत्यंत भव्यता के साथ कालीबाड़ी मैदान पहुंची।
मासी बाड़ी पहुंचे भगवान, सात दिनों तक रहेंगे विराजमान
कालीबाड़ी मैदान पहुंचने के बाद भगवान मदन मोहन को पूरे आदर के साथ उनकी मौसी के घर में विराजमान कराया गया। इसके बाद पुरोहित ने विधि-विधान से भगवान की भव्य संध्या आरती की, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। आरती के पश्चात भक्तों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया।
क्या है परंपरा?
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, रथयात्रा के दिन भगवान मदन मोहन सात दिनों के लिए अपनी मौसी के घर (मासी बाड़ी) प्रवास पर जाते हैं। ठीक सात दिनों के बाद जब वे अपने मुख्य मंदिर वापस लौटते हैं, तब ‘उल्टा रथयात्रा’ (घूरती रथयात्रा) का भव्य आयोजन किया जाता है।
सैकड़ों वर्ष पुराना है इतिहास: रानी ज्योतिर्मयी ने बनवाया था पीतल का रथ
पाकुड़ शहर में रथयात्रा का इतिहास बेहद गौरवशाली और सैकड़ों वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि मुगल सम्राट अकबर द्वारा पाकुड़ को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद, यहां के आदिम जनजाति पहाड़िया राजा ने इस रथयात्रा की शुरुआत की थी।राजा कुमार कालिदास के शासनकाल में यह यात्रा अत्यंत राजसी ठाठ-बाठ के साथ निकाली जाती थी। इतिहास के पन्नों के अनुसार, तत्कालीन रानी ज्योतिर्मयी ने भगवान मदन मोहन की सवारी के लिए एक विशेष पीतल का रथ बनवाया था, जो आज भी इस ऐतिहासिक यात्रा का मुख्य केंद्र है।
वर्तमान समय में भी यह यात्रा उसी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ निकाली जाती है। इस ऐतिहासिक रथयात्रा में पाकुड़ जिले के अलावा पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होने पहुंचते हैं।
महीने भर चलेगा मेला, आम-कटहल और जलेबी की धूम
रथयात्रा के साथ ही कालीबाड़ी और मेला मैदान में लगभग एक महीने तक चलने वाले भव्य मेले की शुरुआत भी हो गई है। मेले के पहले ही दिन भारी भीड़ उमड़ी। मेले में इस बार भी पारंपरिक रूप से आम, कटहल और गरमा-गरम जलेबियों की जमकर बिक्री हो रही है, जो यहां के मेले का मुख्य आकर्षण है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम, पुलिस बल रहा मुस्तैद
रथयात्रा और मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए जिला व पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। एसपी अनुदीप सिंह के कड़े निर्देश पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पूरे मेला क्षेत्र और रथयात्रा मार्ग की निगरानी सीसीटीवी कैमरों से की जा रही थी।सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए एसडीपीओ कुमार गौरव और नगर थाना प्रभारी अनिल कुमार गुप्ता पुलिस बल के साथ लगातार क्षेत्र में कैंपेनिंग करते दिखे, जिससे पूरी यात्रा शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुई।








