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June 19, 2026 7:19 pm

डॉक्टर दीदी हैं तो क्या डर? हिरणपुर में पशु सखियां ला रहीं बदलाव, खुशहाल हो रहे क‍िसान

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी द्वारा अच्छी पहल

बजरंग पंडित

हिरणपुर प्रखंड के गांवों में जबसे आजीविका पशु सखियों ने जिम्मेदारी संभाली है, गांवोें की तस्वीर बदल गई है. ये पशु सखियां गांव-गांव जाकर बकरियों को कृमि नाशक दवा व टीका लगाती हैं, उनका इलाज करती हैं और इलाज करने के घरेलू नुस्खे भी बताती हैं. इसका असर ये है कि अब इन गांवों में बकरियां बहुत कम बीमार पड़ती हैं, उनकी असमय मृत्यु में कमी आई है. इससे किसानों के घर खुशहाली आ रही । आसमानी बक्सा लेकर एक महिला अपने घरों से निकल पड़ती है. आजीविका पशु सखी के तौर पर कार्य करने वाली इस महिला को ग्रामीण डॉक्टर दीदी कहते हैं, जो बकरियों और मुर्गियों को बीमारी से बचाती हैं. डॉक्टर दीदी गांवों में बकरीपालन को बढ़ावा दे रही हैं, इसके जरिए गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मजबूत भूमिका निभा रही हैं.

गांवों में जब से डॉक्टर दीदियां गांव में काम कर रही हैं, उसके बाद से ही पशुओं की मृत्यु दर में कमी आई है. झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशनल सोसाइटी द्वारा ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया गया है.

हर दिन 100 बकरियों का करती हैं टीकाकरण
फूल किस्कू व मेनोका देवी तथा लक्ष्मी देवी बताती हैं कि दवा देने के लिए सुबह 10 बजे तक का ही समय होता है. इसलिए किसी भी मौसम में सुबह ही निकलना पड़ता है. एक दिन में वो 100 से ज्यादा बकरियों का टीकाकरण व कृमि करण करती हैं. इसके अलावा बकरियों को मौसमी बीमारियों से बचाने के लिए दवाएं भी देती हैं. गांव में पशु सखियों द्वारा बकरियों का ध्यान रखने के कारण अब बकरियों की गुणवत्ता अच्छी होती है. बकरी पालकों की कमाई बढ़ी है. आजीविका पशु सखी बकरियों के अलावा देसी मुर्गियों को भी दवाएं देती हैं. इतना ही नहीं, ट्रेनिंग हासिल करने के बाद पशु सखी इतनी सशक्त हो रही है कि घर में ही घरेलू उपचार के तरीके भी बता रही हैं.

७७: – हिरणपुर प्रखंड के बीपीएम उज्ज्वल रविदास किया कहते है:- प्रखंड अंतर्गत सभी गांवों में आजीविका पशुसखी बकरियों का प्राथमिक इलाज करती हैं. आजीविका पशु सखियां जो हर सुबह घर से निकलती हैं और गांव में घूम-घूम कर बकरियों का कृमि करण व टीकाकरण करती हैं. आजीविका पशु सखियों के आने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि अब गांव में रोग या महामारी से बकरियों की मृत्यु नहीं होती है. जबकि एक वक्त ऐसा भी था जब बीमारी के कारण सैकड़ों बकरियों की मृत्यु हो जाती थी.

७७:- किया कहती है प्रखंड प्रमुख रानी सोरेन :- इन्होंने बताया कि आजीविका पशु सखी की मेहनत रंग ला रही है, प्रखंड में बकरियों की मृत्यु दर में कमी आई है। प्रखंड की महिलाएं बकरी पालन कर आत्मनिर्भर बन रही है।

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