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June 19, 2026 7:59 am

बड़े ब्रांड को भूल जाएं…ट्राई करें पत्ते से बनी टोपी,धूप-बारिश से करेगी बचाव

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कैलाश कुमार/बोकारो. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर बोकारो के गोमिया प्रखंड के ललपनिया स्थित लुगूबुरू घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ में आयोजित सरना धर्म सम्मेलन में देश विदेश से आए आदिवासियों द्वारा लुगू बाबा की पूजा अर्चना की गई. लुगूबुरू में आयोजित इस मेले में पश्चिम बंगाल के मलीबोनी के गांव से आए आदिवासी कारीगर विक्रम सोरेन द्वारा तैयार पत्तियों से बनी टोपी प्रमुख आकर्षण का केंद्र रही, जिसे देख लोगों ने कारीगर की जमकर तारीफ की.

आदिवासी कारीगर विक्रम ने लोकल 18 को बताया कि पत्तों से बनी टोपियां बनाने के लिए खास शाल, महुआ और बाम्बू के पत्ते का उपयोग किया जाता है. इसमें सबसे पहले जंगल से पत्तों को ध्यान से चुनकर लाया जाता है. फिर बास की पतली सी छड़ी से टोपी का सांचा तैयार किया जाता है और आखिर में पत्तों को सुखाकर एक साथ बांध दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 600 पत्तों का उपयोग होता है.

आदिवासी संस्कृति की विशेष पहचान है यह टोपी
कारीगर विक्रम ने बताया कि एक टोपी की कीमत 150 रुपए से लेकर 200 में हैं. वह इस टोपी की बिक्री आमतौर पर मेले के अलावा भीड़ भाड़ वाले बाजारों में करते हैं. प्रत्येक दिन वह 60 से लेकर 70 टोपियों की बिक्री कर लेते हैं. टोपी बनाने के प्रशिक्षण को लेकर विक्रम ने बताया कि यह प्राचीन कला है जो उन्होंने अपने दादाजी से सीखी है. यह टोपी आदिवासी सामाजिक संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान है, जो आदिवासी कला को दर्शाती है.

धूप-पानी से बचने के लिए होता है उपयोग
टोपी खरीदने आए ग्राहक सिंघराय ने बताया कि पुराने जमाने में इन टोपियों का उपयोग धूप और पानी से बचने के लिए हुआ करता था, लेकिन आज फैशन स्टेटमेंट की तरह भी लोग इसका उपयोग करते हैं. पत्तों से बनी टोपी झारखंड की पुरानी कला परंपरा है, जिसे यह कारीगर पुनर्जीवित कर रहे हैं.

Tags: Bokaro news, Jharkhand news, Latest hindi news, Local18

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