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July 2, 2026 12:47 am

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सरकारी खजाने पर बिचौलियों का जादू: बिना वेंडर के ही पाकुड़ में डकार गए करोड़ों! डीपीएम साहब की ‘कृपा’ पर उठे सवाल!

एक व्यक्ति, तीन कुर्सियां: ‘सुपरमैन’ डीपीएम।

पाकुड़: कहते हैं सरकारी सिस्टम में बिना ‘ऊपर’ की मर्जी के एक पत्ता भी नहीं हिलता, लेकिन पाकुड़ प्रखंड में तो बिना किसी अधिकृत वेंडर (सरकारी दूल्हे) के ही करोड़ों रुपये की ‘बारात’ घूम गई और सामान की सप्लाई भी हो गई! जी हां, पाकुड़ जिले की पंचायतों में 14वीं और 15वीं वित्त आयोग की योजनाओं के तहत एक ऐसा ‘चमत्कार’ हुआ है, जिसने पारदर्शिता और नियमों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं।

बाहरी कलाकारों का ‘इन-हाउस’ जलवा

स्थानीय स्तर पर पंजीकृत और कतार में खड़े वेंडरों को ठेंगा दिखाते हुए, इस खेल के मुख्य किरदार हिरणपुर और साहिबगंज के बिचौलिया बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि इन दोनों बाहरी कलाकारों को किसी और का नहीं, बल्कि प्रभारी जिला परियोजना प्रबंधक (डीपीएम) आनंद कुमार का भरपूर ‘रिमोट कंट्रोल संरक्षण’ प्राप्त था। साहिबगंज जिला के बरहरवा वाले की प्रतिभा तो ऐसी है कि उन्होंने अलग-अलग नामों से बिल पेश करके सरकारी खजाने से भुगतान भी निकाल लिया। इसे कहते हैं—नाम अनेक, काम एक और जेब भारी!

20 हजार का सामान, 1 लाख का बिल: इसे कहते हैं ‘स्मार्ट’ विकास

पंचायतों में लगी योजनाओं के दामों को सुनकर तो किसी भी आम आदमी को चक्कर आ जाए जैसे जादुई आरओ मशीन: बाजार में जिस आरओ वाटर प्यूरीफायर की कीमत 20 से 25 हजार रुपये है, सरकारी कागजों पर उस पर एक लाख रुपये से अधिक का ‘शाही’ बिल बनाकर भुगतान कर दिया गया।

अधूरा ‘ज्ञान केंद्र’: ज्ञान केंद्रों में स्मार्ट टीवी लगाने का दावा तो हुआ, लेकिन वे टीवी सिर्फ कागजों पर ही ‘स्मार्ट’ रह गए, धरातल पर आपूर्ति अधूरी है।

लापता क्वालिटी: जल मीनार और हैंडवॉश स्टेशनों पर घटिया सामग्री की ऐसी ‘कृपा’ बरसी है कि उद्घाटन के कुछ समय बाद ही योजनाएं वेंटिलेटर पर पहुंच गई हैं।

प्रखंड समन्वयक, तीन कुर्सियां: ‘सुपरमैन’ डीपीएम

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प भूमिका डीपीएम आनंद कुमार की है। आनंद बाबू इस समय पाकुड़ प्रखंड समन्वयक, लिट्टीपाड़ा प्रखंड समन्वयक और प्रभारी जिला परियोजना प्रबंधक (ई-पंचायत) जैसी भारी-भरकम जिम्मेदारियों को अकेले संभाल रहे हैं। अब जब एक ही कंधे पर इतने विभागों का बोझ होगा, तो बाहरी लोग आकर हाथ तो बंटाएंगे ही! सवाल यह है कि जिले में अधिकारियों का इतना अकाल है या फिर साहब की काबिलियत के आगे सब फीके हैं?

अधिकारियों का ‘गजब’ यू-टर्न!

जब इस महा-घोटाले पर पंचायती राज पदाधिकारी और विभाग से पूछा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया हमने तो किसी वेंडर को अधिकृत ही नहीं किया।अब साहब, जब आपने वेंडर तय ही नहीं किया, तो क्या करोड़ों का सामान आसमान से टपका था या पंचायतों में खुद चलकर आ गया था? वहीं, जिले के उप विकास आयुक्त का कहना है कि उन्हें फिलहाल पूरी जानकारी नहीं है, जांच के बाद ही कुछ कह पाएंगे। यानी जब तक जांच होगी, तब तक गंगा में बहुत सा पानी (और खजाने से बहुत सा पैसा) बह चुका होगा।

अब पाकुड़ के ग्रामीण और स्थानीय लोग जिला प्रशासन से पूछ रहे हैं कि यह सिर्फ सरकारी लापरवाही है या फिर ‘ऊपर से नीचे तक’ मिलीभगत का कोई मेगा-शो? देखना होगा कि प्रशासन इस ‘बिना वेंडर वाली सप्लाई’ के जादूगरों को पकड़ पाता है या फिर फाइलें भी किसी सरकारी अलमारी में ‘ज्ञान’ लेती रहेंगी।

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