100 साल में आबादी में अपेक्षित वृद्धि नहीं होने पर चिंता, स्वास्थ्य-शिक्षा और पेयजल की चुनौतियों से निपटने की बनेगी रणनीति
पाकुड़। पहाड़िया समाज की बुनियादी समस्याओं के समाधान और सर्वांगीण विकास के लिए अब ठोस कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। पाकुड़ के रवींद्र भवन टाउन हॉल में आयोजित जिला स्तरीय कार्यशाला में समुदाय की समस्याओं, सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यशाला में प्रशासनिक अधिकारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं और समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
एक सदी में आबादी नहीं बढ़ने पर चिंता।
कार्यशाला में इस बात पर चिंता जताई गई कि पिछले करीब 100 वर्षों में पहाड़िया जनजाति की आबादी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। इसके पीछे बदलती भौगोलिक परिस्थितियों, पेयजल की कमी, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और मनोवैज्ञानिक कारकों को प्रमुख चुनौती बताया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए समुदाय के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और जीवन प्रत्याशा में सुधार के लिए विशेष रणनीति बनाने की जरूरत बताई गई।
संस्कृति की रक्षा के साथ विकास पर जोर
झारखंड में संरक्षित आदिम जनजाति पहाड़िया की सबसे अधिक आबादी पाकुड़ जिले में बताई जाती है। समुदाय के लोग मुख्य रूप से अमड़ापाड़ा और लिट्टीपाड़ा क्षेत्रों में रहते हैं। कार्यशाला में कहा गया कि पहाड़िया समाज की परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए उसे विकास की मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी है। इसके लिए पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों पर विशेष ध्यान देने पर बल दिया गया।
राज्य स्तरीय पहल को जिला स्तर पर विस्तार
सर्व सेवा समिति के कार्यकर्ता देवांजन ने बताया कि जुलाई में आयोजित राज्य स्तरीय कॉन्क्लेव के बाद इस पहल को जिला स्तर पर आगे बढ़ाया गया है। इसका उद्देश्य सरकारी योजनाओं और विकास सहयोगियों के प्रयासों में समन्वय स्थापित कर पहाड़िया समुदाय के समग्र विकास को गति देना है। कार्यशाला में सामने आए सुझावों के आधार पर मजबूत कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया गया, ताकि समुदाय की समस्याओं का समाधान व्यावहारिक स्तर पर हो सके। उद्देश्य केवल योजनाएं बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि पहाड़िया परिवारों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार लाना है।








