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May 18, 2026 10:54 pm

बीस साल से मुआवजे को तरसता किसान, सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा—प्रशासन की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल।

मिसफिका हसन ने एक्स पर जिला प्रशासन की खोली पोल, गरीब किसान के हक के लिए सीधे सीएम सोरेन से किया सवाल।

कहा नेता प्रतिपक्ष के पत्र के बाद भी नहीं पसीजा जिला प्रशासन

पाकुड़: विकास की बलि चढ़ना क्या होता है, यह चंडालमारा के रहने वाले गणेश मंडल से बेहतर कोई नहीं जान सकता। सड़क चौड़ीकरण के लिए अपनी पुस्तैनी जमीन देने के 20 साल बाद भी यह किसान दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। हद तो तब हो गई जब झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के लिखित निर्देश को भी पाकुड़ जिला प्रशासन ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब यह मामला सोशल मीडिया पर तूल पकड़ रहा है और सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंच गया है।

क्या है पूरा मामला?

महेशपुर प्रखंड के चंडालमारा निवासी गणेश मंडल की मौजा चंडालमारा (थाना नं. 91, दाग नं. 139) स्थित 0.70 एकड़ (70 डिसमिल) जमीन पथ निर्माण विभाग द्वारा सड़क चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित की गई थी। कागजों के मुताबिक, अंचल कार्यालय महेशपुर ने 20 अगस्त 2018 को ही (पत्रांक 885) जिला भू-अर्जन पदाधिकारी को रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन मुआवजा आज तक सरकारी फाइलों में ही दबा है।

बाबूलाल मरांडी के पत्र पर भी नहीं हुई कार्रवाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 11 मार्च 2026 को पाकुड़ उपायुक्त (DC) को पत्र (पत्रांक 173/LOP/2026) लिखकर स्पष्ट निर्देश दिया था कि आवेदक की आर्थिक स्थिति दयनीय है, इसलिए उन्हें यथाशीघ्र मुआवजा दिलाया जाए। लेकिन प्रशासन की बेरुखी जस की तस बनी हुई है। भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय मंत्री मिसफिका हसन ने एक्स के माध्यम से कहा कि”जब नेता प्रतिपक्ष के आधिकारिक निर्देशों को भी जिला प्रशासन गंभीरता से नहीं ले रहा, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे? मुख्यमंत्री जी, मामले का संज्ञान लें।

दाने-दाने को मोहताज हुआ परिवार

पीड़ित गणेश मंडल ने अपने आवेदन में भावुक होते हुए लिखा है कि जमीन जाने के बाद उनके पास जीविकोपार्जन का कोई साधन नहीं बचा है। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने दिसंबर 2025 में भी रिमाइंडर दिया था, जिस पर प्रशासन ने अब तक कोई सुध नहीं ली है।अंचल कार्यालय और भू-अर्जन विभाग के बीच फाइलों का समय पर आदान-प्रदान न होना।कई बार विभाग जमीन तो ले लेता है, लेकिन मुआवजे की राशि आवंटित करने में देरी करता है।रसूखदारों के काम तुरंत हो जाते हैं, लेकिन गणेश मंडल जैसे गरीब किसानों की फाइलें धूल फांकती रहती हैं।अब देखना यह है कि सोशल मीडिया पर मामला उछलने और सीधे मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचने के बाद पाकुड़ प्रशासन की नींद खुलती है या गणेश मंडल का इंतजार और लंबा होता है।

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