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August 9, 2026 12:03 am

9 अगस्त : आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और प्रकृति के सम्मान का दिन

विश्व आदिवासी दिवस पर जल, जंगल और जमीन से जुड़ी परंपराओं के संरक्षण का संकल्प जरूरी

पाकुड़। 9 अगस्त महज कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि दुनिया भर के आदिवासी समुदायों की पहचान, अधिकार, संस्कृति, परंपरा और अस्मिता के सम्मान का महत्वपूर्ण दिन है। संयुक्त राष्ट्र के आह्वान पर प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस (विश्व आदिवासी दिवस) मनाया जाता है। यह दिवस आदिवासी समाज के अधिकारों, उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक ज्ञान, भाषा, रीति-रिवाज और जल-जंगल-जमीन से उनके गहरे रिश्ते को सम्मान देने का अवसर है। इस दिवस का इतिहास वर्ष 1982 से जुड़ा है। इसी वर्ष 9 अगस्त को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजिनस पॉपुलेशंस की पहली बैठक हुई थी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव संख्या 49/214 के माध्यम से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने का निर्णय लिया। इसका प्रमुख उद्देश्य आदिवासी समुदायों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों की ओर वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित करना है।

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व आदिवासी जीवन-दर्शन की पहचान

आदिवासी समाज की संस्कृति केवल पर्व-त्योहार, नृत्य और गीत तक सीमित नहीं है। उसकी जीवन-पद्धति प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित रही है। जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज के लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका, संस्कृति और पहचान का आधार हैं। आदिवासी रीति-रिवाजों में प्रकृति के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता है। सरना, जाहेरथान और अन्य पारंपरिक पूजा स्थलों पर प्रकृति और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। सरहुल, सोहराय, बाहा, करमा और माघे जैसे पर्व आदिवासी समाज के प्रकृति, कृषि, पशुधन, ऋतुचक्र और सामुदायिक जीवन से जुड़े होने की जीवंत मिसाल हैं। इन पर्वों में सामूहिकता, पारंपरिक गीत-संगीत, मांदर की थाप, नृत्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रमुख होता है।

झारखंड की पहचान आदिवासी संस्कृति से गहराई से जुड़ी

विश्व आदिवासी दिवस का महत्व झारखंड के संदर्भ में और बढ़ जाता है। झारखंड की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान आदिवासी जीवन-पद्धति, प्रकृति और संघर्ष की विरासत से गहराई से जुड़ी है। राज्य में संताल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, भूमिज, पहाड़िया, बिरहोर समेत अनेक जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। झारखंड की धरती आदिवासी समाज के लंबे संघर्षों की साक्षी रही है। तिलका मांझी, सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और भगवान बिरसा मुंडा जैसे महानायकों ने शोषण, अन्याय और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। विशेष रूप से बिरसा मुंडा का उलगुलान आदिवासी अस्मिता, स्वशासन और अधिकार चेतना का ऐतिहासिक प्रतीक है। इन संघर्षों की विरासत ने झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन को मजबूत आधार दिया तथा अलग झारखंड राज्य के निर्माण की चेतना को भी दिशा प्रदान की।

सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, अधिकारों के प्रति संकल्प का दिन

विश्व आदिवासी दिवस का उद्देश्य केवल पारंपरिक वेशभूषा पहनना, नृत्य-संगीत प्रस्तुत करना या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं है। यह दिन आत्ममंथन और संकल्प का भी अवसर है। आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपरा, पारंपरिक ज्ञान, भूमि अधिकार, वनाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन से जुड़े सवालों को समझना और उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ना भी इस दिवस की सार्थकता है। आदिवासी समाज की मौखिक परंपराओं, लोकगीतों, लोककथाओं, पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान, कृषि पद्धतियों और प्रकृति संरक्षण की परंपराओं को संरक्षित करना आज के समय की बड़ी जरूरत है। आधुनिक विकास जरूरी है, लेकिन विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें आदिवासी समाज की भागीदारी सुनिश्चित हो और उसकी सांस्कृतिक पहचान तथा प्राकृतिक संसाधनों के साथ उसके पारंपरिक संबंधों का सम्मान बना रहे।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना जरूरी

बदलते समय में आदिवासी समाज के सामने अपनी परंपराओं और भाषाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती भी है। आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी मातृभाषा, लोककला, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाज और सामुदायिक मूल्यों को बचाए रखना जरूरी है।
विश्व आदिवासी दिवस इसी बात की याद दिलाता है कि आदिवासी संस्कृति केवल आदिवासी समाज की धरोहर नहीं, बल्कि देश की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। झारखंड के लिए यह दिवस इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां की पहचान प्रकृति, सामुदायिक जीवन और आदिवासी जीवन-दर्शन से गहराई से जुड़ी हुई है।

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