मेदिनीनगर :शहर की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। चौड़ी होती सड़कें, रंगीन लाइटों से सजे चौक-चौराहे, करोड़ों की लागत से बने सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट्स, नदी किनारे विकसित किए गए रिवर फ्रंट, बड़े-बड़े होर्डिंग और विकास के दावे सुनकर ऐसा लगने लगा था कि शहर अब एक नई पहचान की ओर बढ़ रहा है। लेकिन जैसे-जैसे शहर की चमक बढ़ी, वैसे-वैसे उसकी असल तस्वीर भी सामने आने लगी। आज हालात यह हैं कि जिन योजनाओं को शहर की खूबसूरती और आधुनिक पहचान का प्रतीक बताया गया था, वही योजनाएं प्रशासनिक अनदेखी और रख-रखाव की कमी के कारण धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों से सामने आई तस्वीरें अब यह साफ संकेत दे रही हैं कि विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च तो हुए, लेकिन उन योजनाओं को संभालने और बचाने की जिम्मेदारी कहीं खो गई।
शहर के प्रमुख इलाकों में अगर कोई आम नागरिक सुबह या शाम निकलता है तो उसे सबसे पहले गंदगी की मार झेलनी पड़ती है। रंका राज कॉम्प्लेक्स के आसपास, जिला स्कूल चौक, छहमुहान, बेलवाटिका, रेडमा रोड और कई व्यस्त मार्गों पर सड़क किनारे कूड़े का ढेर अब आम दृश्य बन चुका है। कई जगहों पर नालियों का पानी सड़क पर बहता नजर आता है तो कहीं दीवारों के पास खुले में पेशाब करने वालों ने सार्वजनिक स्थलों को बदहाल बना दिया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि शहर में जगह-जगह स्वच्छता अभियान और जागरूकता के पोस्टर दिखाई देते हैं, लेकिन जमीन पर उनकी हकीकत बिल्कुल उलट नजर आती है। जिन रास्तों से रोज हजारों लोग गुजरते हैं, वहीं दीवारों के किनारे फैली गंदगी और बदबू शहर की पूरी छवि को खराब कर रही है।
जब इन इलाकों की तस्वीरें कैमरे में कैद की जा रही थीं, तब कई लोग बिना किसी झिझक के सार्वजनिक स्थलों को गंदा करते नजर आए। ऐसा लग रहा था मानो लोगों के भीतर नागरिक जिम्मेदारी का एहसास धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा हो। शहर के बुजुर्गों का कहना है कि पहले लोग सार्वजनिक जगहों को अपना समझते थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी हो गई है कि सड़क, पार्क और दीवारों को लोग अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि यदि नगर निगम नियमित निगरानी और कार्रवाई करे तो काफी हद तक हालात सुधर सकते हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा कहीं नजर नहीं आता।
उधर कोयल नदी के किनारे बनाया गया “द रिवर फ्रंट”, जिसे कभी शहर की खूबसूरती का सबसे बड़ा आकर्षण बताया गया था, अब बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया यह प्रोजेक्ट लोगों को सुकून देने, परिवारों को बेहतर माहौल उपलब्ध कराने और शहर को नई पहचान देने के उद्देश्य से बनाया गया था। शुरुआती दिनों में यहां भारी भीड़ उमड़ती थी। लोग परिवार के साथ शाम बिताने आते थे, बच्चे खेलते थे और युवा सेल्फी लेते नजर आते थे। लेकिन अब हालात धीरे-धीरे बदल चुके हैं। शाम होते ही यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगने लगता है। नदी किनारे बैठकर शराबखोरी करना, प्लास्टिक की बोतलों को वहीं छोड़ देना और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना अब आम बात बन चुकी है।
रिवर फ्रंट पर जनता के बैठने के लिए लगाई गई बेंचें, जिन पर प्रथम उप-मेयर राकेश कुमार सिंह उर्फ मंगल सिंह का नाम अंकित है, अब कई जगहों पर टूट चुकी हैं। कुछ बेंचों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि लोग वहां बैठने से भी डरते हैं। वहीं रिवर फ्रंट की खूबसूरती बढ़ाने के लिए लगाई गई लाल रंग की टाइल्स कई जगहों से उखड़ चुकी हैं। रात के समय पर्याप्त निगरानी नहीं होने के कारण यहां असामाजिक गतिविधियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा व्यवस्था और रख-रखाव पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में यह पूरा प्रोजेक्ट केवल एक खंडहर बनकर रह जाएगा।
शहर की बदहाली का एक और बड़ा उदाहरण शाहपुर के पास देखने को मिला, जहां महापौर अरुणा शंकर की तस्वीर वाला विशाल होर्डिंग पिछले कई दिनों से क्षतिग्रस्त अवस्था में हवा में झूल रहा है। फटा हुआ बैनर दूर से ही प्रशासनिक लापरवाही की कहानी कहता नजर आता है। राहगीरों का कहना है कि यह होर्डिंग कभी भी गिर सकता है और किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है, लेकिन जिम्मेदार विभाग की नजर शायद अभी तक उस तक नहीं पहुंची है। लोगों का कहना है कि जब शहर के बीचोंबीच लगे बड़े-बड़े होर्डिंग तक समय पर नहीं सुधारे जा रहे हैं, तो बाकी व्यवस्थाओं का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
मेदिनीनगर शहर में विकास की जो तस्वीर दिखाई जाती है, उसकी असलियत इन बदहाल इलाकों में साफ नजर आने लगी है। कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिनका उद्घाटन बड़े स्तर पर हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनकी हालत खराब होने लगी। कहीं स्ट्रीट लाइट बंद पड़ी है, कहीं सड़क किनारे लगे डिवाइडर टूटे हुए हैं, कहीं नालियां जाम हैं तो कहीं सार्वजनिक पार्कों में गंदगी फैली हुई है। शहर के लोग अब यह सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर विकास का मतलब केवल निर्माण कार्य तक ही सीमित क्यों रह गया है। क्या किसी योजना को बनाकर छोड़ देना ही प्रशासनिक सफलता मानी जाएगी या फिर उसकी देखरेख भी उतनी ही जरूरी है?
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि शहर की बदहाल व्यवस्था का असर कारोबार पर भी पड़ने लगा है। बाहर से आने वाले लोग जब शहर की सड़कों पर गंदगी, टूटी संरचनाएं और बदहाल सार्वजनिक स्थल देखते हैं तो शहर की छवि खराब होती है। वहीं युवाओं का कहना है कि सोशल मीडिया पर शहर को सुंदर दिखाने की कोशिश जरूर होती है, लेकिन असल तस्वीर उससे बिल्कुल अलग है। लोग यह भी कहते हैं कि अगर प्रशासन और नगर निगम ईमानदारी से नियमित निरीक्षण करे, सफाई व्यवस्था को मजबूत बनाए और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों पर सख्ती दिखाए, तो शहर की सूरत बदल सकती है।
शहर के कई सामाजिक संगठनों का भी मानना है कि केवल प्रशासन को दोष देने से काम नहीं चलेगा। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सार्वजनिक स्थलों को गंदा करना, शराब की बोतलें फेंकना, दीवारों को खराब करना और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना भी शहर को बदहाल बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। लेकिन सवाल यह भी है कि जब निगरानी और कार्रवाई कमजोर होगी तो ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती रहेंगी।
आज मेदिनीनगर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है जहां विकास और बदहाली दोनों की तस्वीरें एक साथ नजर आती हैं। एक तरफ करोड़ों के प्रोजेक्ट्स हैं, चमकदार उद्घाटन हैं, बड़े-बड़े दावे हैं, तो दूसरी तरफ टूटी बेंचें, उखड़ी टाइल्स, हवा में झूलते होर्डिंग, कूड़े के ढेर और बदहाल सार्वजनिक स्थल हैं। शहर की यह तस्वीर अब लोगों के भीतर नाराजगी भी पैदा कर रही है और चिंता भी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में प्रशासन इन हालातों को गंभीरता से लेकर शहर की बदहाल होती सूरत को सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगा, या फिर विकास की चमक के पीछे छिपी यह सच्चाई यूं ही धीरे-धीरे शहर की पहचान को निगलती रहेगी।










